नई दिल्ली: भारतीय छात्रों के लिए अमेरिका लंबे समय से सपनों की मंजिल रहा है, जहां बेहतर शिक्षा और करियर के अवसर मिलते थे. लेकिन अब यह तस्वीर बदल रही है. जीएमएसी के नवीनतम श्वेत पत्र और आवेदन रुझान सर्वेक्षण से साफ है कि वीजा की अनिश्चितता, महंगाई और मुद्रा की कमजोरी ने भारतीयों के दाखिले में भारी गिरावट ला दी है. अगस्त 2025 में अमेरिकी यूनिवर्सिटी में भारतीय छात्रों की संख्या 45% कम हुई. वहीं एशिया और यूरोप के कार्यक्रमों में रुचि बढ़ रही है. भारत खुद अंतरराष्ट्रीय छात्रों को आकर्षित कर रहा है, जो वैश्विक शिक्षा के नक्शे में बड़ा बदलाव दिखाता है.
वीजा संबंधी देरी, अस्वीकृति और सख्त नीतियां मुख्य वजह हैं. अमेरिका में लगभग 90% कार्यक्रमों ने भारत को उन देशों में शामिल किया जहां छात्रों ने जमा राशि दी लेकिन वीजा न मिलने से नहीं पहुंच सके. रुपये का रिकॉर्ड निचला स्तर आने से अमेरिकी शिक्षा की लागत और महंगी हो गई. छात्र अब वित्तीय बोझ को ध्यान से देख रहे हैं. कनाडा में अध्ययन परमिट की सीमा और ब्रिटेन में आश्रितों पर प्रतिबंध ने भी आवेदनों को प्रभावित किया.
जीएमएसी के सर्वे से पता चलता है कि गैर-अमेरिकी उम्मीदवारों में अमेरिका पढ़ने की इच्छा 2019 के 57% से 2025 में 42% रह गई. पश्चिमी यूरोप की प्राथमिकता स्थिर रही, जबकि एशिया और पूर्वी यूरोप के लिए आवेदन बढ़े. मध्य और दक्षिण एशियाई छात्र अब घरेलू या निकटवर्ती क्षेत्रों को तरजीह दे रहे हैं. भू-राजनीतिक स्थितियां और रोजगार के बाद के अवसर अब फैसले में बड़ा रोल निभा रहे हैं.
एशिया-प्रशांत के 54% कार्यक्रमों में अंतरराष्ट्रीय नामांकन बढ़ा, जबकि अमेरिका के दो-तिहाई में गिरावट आई. भारत में अंतरराष्ट्रीय आवेदन 25% बढ़े, जो देश को नया गंतव्य बना रहा है. यूरोप (यूके छोड़कर) में भी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय आवेदन मजबूत हुए. छात्र अब रैंकिंग से ज्यादा वीजा स्पष्टता, पोस्ट-स्टडी वर्क और वहनीयता पर फोकस कर रहे हैं.
भारत वैश्विक प्रतिभा का बड़ा स्रोत बना हुआ है. दो-पांचवें से ज्यादा भारतीय बिजनेस स्कूलों ने अमेरिका को अपना टॉप अंतरराष्ट्रीय स्रोत बताया. लेकिन अब घरेलू कार्यक्रमों में रुचि बढ़ रही है. जीएमएसी का मानना है कि भविष्य में फैसले वीजा नीतियों, रोजगार अवसरों और लागत पर ज्यादा निर्भर होंगे. छात्र अब विविध विकल्प तलाश रहे हैं, जो वैश्विक शिक्षा को नया रूप देगा.