नई दिल्ली: अक्सर लोग सोचते हैं कि क्या उनकी जमीन के नीचे तेल या प्राकृतिक गैस हो सकती है. फिल्मों में दिखाया जाता है कि अचानक खुदाई हुई और तेल निकल आया, लेकिन असल जिंदगी में यह प्रक्रिया काफी जटिल, वैज्ञानिक और महंगी होती है. तेल लाखों-करोड़ों साल में समुद्री जीवों, पौधों और दबाव के कारण बनता है और जमीन के अंदर चट्टानों के बीच फंसा रहता है. इसे ढूंढना आसान नहीं होता और इसके लिए कई चरणों में जांच की जाती है.
सबसे पहले वैज्ञानिक उस क्षेत्र की भूगर्भीय संरचना का अध्ययन करते हैं. यह देखा जाता है कि वहां किस प्रकार की चट्टानें मौजूद हैं. आमतौर पर तेल तलछटी चट्टानों में पाया जाता है, क्योंकि ये परतों में बनी होती हैं और इनके बीच तेल जमा हो सकता है. साथ ही यह भी जांचा जाता है कि क्या उस क्षेत्र में प्राकृतिक ट्रैप मौजूद हैं, जहां तेल और गैस फंस सकती है. यह भी देखा जाता है कि क्या वह इलाका पहले समुद्र या घने जंगल का हिस्सा रहा है.
कुछ प्राकृतिक संकेत भी तेल या गैस की संभावना दिखा सकते हैं. जैसे जमीन या पानी की सतह पर काला या चिकना पदार्थ दिखना, पानी में लगातार बुलबुले उठना या सड़े अंडे जैसी गंध आना. हालांकि ये संकेत केवल संभावना बताते हैं, पक्की जानकारी नहीं देते.
तेल खोजने की सबसे अहम तकनीक भूकंपीय सर्वे होती है. इसमें जमीन के अंदर ध्वनि तरंगें भेजी जाती हैं, जो अलग-अलग चट्टानों से टकराकर वापस लौटती हैं. इन तरंगों को जियोफोन नाम के उपकरण रिकॉर्ड करते हैं. इसके आधार पर जमीन के अंदर की 2D और 3D तस्वीर तैयार की जाती है, जिससे यह पता चलता है कि कहां तेल या गैस होने की संभावना है.
इसके अलावा ग्रैविटी सर्वे में जमीन के गुरुत्वाकर्षण में बदलाव मापा जाता है. मैग्नेटिक सर्वे में पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का अध्ययन किया जाता है. वहीं सैटेलाइट और एरियल सर्वे के जरिए बड़े इलाके की जानकारी जुटाई जाती है. इन सभी तकनीकों से वैज्ञानिक एक स्पष्ट अनुमान लगाते हैं.
जब सर्वे में अच्छे संकेत मिलते हैं, तब टेस्ट ड्रिलिंग की जाती है. इसमें एक छोटा कुआं खोदकर यह जांचा जाता है कि वास्तव में तेल है या नहीं और कितना है. यह सबसे महंगा और जोखिम भरा चरण होता है. अगर तेल मिल जाता है, तो फिर बड़े स्तर पर ड्रिलिंग शुरू होती है और तेल को पाइपलाइन के जरिए रिफाइनरी तक पहुंचाया जाता है.
Disclaimer: बिना सरकारी अनुमति के तेल की खोज या खुदाई करना गैरकानूनी है. इसके लिए परमिट, पर्यावरण मंजूरी और कानूनी समझौते जरूरी होते हैं.