अगर आप भारत में रहते हैं और अमेरिकी कंपनियों के शेयर खरीदना चाहते हैं, तो यह संभव है. भारतीय रिजर्व बैंक विदेशी निवेश की अनुमति देता है, लेकिन इसके लिए तय कानूनी प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है. निवेशक LRS के तहत पैसा विदेश भेजकर विदेशी शेयरों में निवेश कर सकते हैं.
भारत से विदेश में निवेश का प्रमुख ढांचा विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम यानी FEMA और RBI की उदारीकृत प्रेषण योजना (LRS) से जुड़ा है. LRS के तहत कोई भारतीय निवासी एक वित्तीय वर्ष में अधिकतम 2.5 लाख डॉलर तक विदेश भेज सकता है. इस रकम का इस्तेमाल विदेशी शेयरों में निवेश सहित निर्धारित उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है. Tesla, Apple या Microsoft जैसी सूचीबद्ध अमेरिकी कंपनियों के शेयर खरीदने वाले सामान्य खुदरा निवेशक आमतौर पर Overseas Portfolio Investment की श्रेणी में आते हैं. हालांकि निवेश करते समय विदेशी मुद्रा से जुड़े नियमों और बैंकिंग प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है.
अमेरिकी शेयरों में सीधे निवेश करने के लिए भारतीय निवेशक ऐसी सेवा या प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर सकते हैं, जो विदेशी बाजारों में निवेश की सुविधा देता हो. आम तौर पर पहले अकाउंट खोला जाता है, फिर LRS के तहत बैंकिंग चैनल से रकम विदेश भेजी जाती है और उसे संबंधित विदेशी बाजार की मुद्रा में बदला जाता है. इसके बाद निवेशक अमेरिकी एक्सचेंज पर उपलब्ध शेयर खरीद सकता है. विदेशी कंपनी में 10 प्रतिशत या उससे अधिक हिस्सेदारी और कंपनी पर नियंत्रण जैसे मामलों में निवेश का वर्गीकरण अलग हो सकता है. इसलिए बड़ी हिस्सेदारी लेने वालों पर सामान्य खुदरा निवेश से अलग नियम लागू हो सकते हैं.
विदेशी शेयर खरीदने के बाद सिर्फ मुनाफे पर नजर रखना पर्याप्त नहीं है. भारत में ऐसे निवेश से जुड़े टैक्स नियमों को भी समझना जरूरी है. शेयर बेचने पर होने वाला लाभ लागू नियमों के अनुसार कैपिटल गेन के तौर पर कर योग्य हो सकता है, जबकि विदेशी शेयरों से मिलने वाला डिविडेंड आम तौर पर आय के रूप में टैक्स के दायरे में आता है. इसके अलावा विदेशी संपत्तियों और निवेश की जानकारी आयकर रिटर्न में बताना पड़ सकता है. नियमों के मुताबिक सही जानकारी नहीं देने पर टैक्स संबंधी परेशानी और जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है.
अमेरिकी शेयरों में निवेश करने से भारतीय निवेशक अपने पोर्टफोलियो को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक फैला सकते हैं, लेकिन इसमें जोखिम भी मौजूद हैं. शेयर की कीमत में बदलाव के अलावा डॉलर और रुपये की विनिमय दर का असर भी निवेश के मूल्य पर पड़ सकता है. इसलिए केवल किसी बड़ी अमेरिकी कंपनी का नाम देखकर निवेश करना उचित नहीं है. निवेशक को कंपनी, बाजार, शुल्क, टैक्स और विदेशी मुद्रा से जुड़े जोखिमों को समझना चाहिए. निवेश का फैसला अपने वित्तीय लक्ष्य और जोखिम उठाने की क्षमता के आधार पर लेना बेहतर है. जरूरत पड़ने पर योग्य वित्तीय सलाहकार से सलाह लेना भी उपयोगी हो सकता है.