केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के संगठनों की ओर से 8वें वेतन आयोग के कामकाज की शर्तों में बदलाव की मांग लगातार उठाई जा रही है. भारत पेंशनर्स समाज और ऑल इंडिया डिफेंस एम्प्लॉइज फेडरेशन समेत कई संगठनों का कहना है कि पेंशन को केवल सरकार पर पड़ने वाले खर्च के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए.
संगठनों ने गैर-अंशदायी पेंशन व्यवस्था से जुड़ी बिना वित्तीय प्रावधान वाली लागत के उल्लेख को हटाने की मांग भी की है. उनका तर्क है कि सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन कर्मचारियों और उनके परिवारों की आर्थिक सुरक्षा का अहम आधार है.
पेंशन संगठनों की एक प्रमुख मांग 1 जनवरी 2026 से पहले सेवानिवृत्त हो चुके कर्मचारियों से जुड़ी है. संगठन चाहते हैं कि ऐसे कर्मचारियों की पेंशन और पारिवारिक पेंशन में भी 8वें वेतन आयोग के तहत जरूरी बदलाव पर विचार किया जाए. इस मांग पर फैसला पूरी तरह सरकार की नीति और आयोग को दिए गए अधिकार क्षेत्र पर निर्भर करेगा. फिलहाल इस संबंध में सरकार की ओर से कोई अंतिम जानकारी सामने नहीं आई है.
वेतन आयोग के कामकाज की शर्तों में बदलाव कोई नई बात नहीं है. पुराने आयोगों के उदाहरण बताते हैं कि सरकार जरूरत पड़ने पर इसमें संशोधन कर सकती है. पांचवें वेतन आयोग के ToR में 1995 और 1996 के बीच चार बार बदलाव किए गए थे. छठे वेतन आयोग की शर्तों में भी दो बार संशोधन हुआ था. सातवें वेतन आयोग के मामले में भी सितंबर 2015 में उसकी रिपोर्ट सौंपने की समय सीमा बढ़ाने के लिए ToR में बदलाव किया गया था. ऐसे में 8वें वेतन आयोग के मामले में भी संशोधन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.
सरकार ने 28 अक्टूबर 2025 को 8वें वेतन आयोग के कामकाज की शर्तों को मंजूरी दी थी. इसके बाद आयोग के गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ी और फरवरी 2026 में उसकी आधिकारिक वेबसाइट शुरू की गई. आयोग अपनी बैठकों और गतिविधियों की जानकारी समय-समय पर साझा करता है. साथ ही कर्मचारियों, पेंशनरों और अन्य संबंधित पक्षों से सुझाव भी लिए जा रहे हैं. अब सबकी नजर इस बात पर है कि सरकार पेंशनकर्मियों की मांगों को आयोग के दायरे में शामिल करने के लिए ToR में कोई बदलाव करती है या नहीं.