पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच सरकार ने उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए बड़ा फैसला लिया है. उत्पाद शुल्क में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की गई है, जिससे तेल कंपनियों पर दबाव कम होगा. हालांकि इस फैसले से सरकारी खजाने पर भी असर पड़ेगा. केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड के अध्यक्ष संजय कुमार अग्रवाल ने बताया कि इस निर्णय से राजस्व में बड़ी कमी आएगी.
सरकार के इस फैसले से अगले 15 दिनों में करीब 7,000 करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान होने का अनुमान है. उद्योग के आंकड़ों के मुताबिक, यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो सालाना नुकसान 1.75 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है. इसके बावजूद सरकार ने आम उपभोक्ताओं को राहत देने को प्राथमिकता दी है.
उत्पाद शुल्क में कटौती का मकसद तेल विपणन कंपनियों के नुकसान को कम करना है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, जिससे कंपनियों पर दबाव बढ़ गया था. इस कदम से कंपनियों की अंडर-रिकवरी कम होगी और उपभोक्ताओं पर अचानक बोझ नहीं पड़ेगा.
सरकार ने डीजल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल पर निर्यात शुल्क भी लगाया है. इससे घरेलू बाजार में ईंधन की उपलब्धता सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी. अनुमान है कि इससे करीब 1,500 करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व मिलेगा, जिससे कुछ हद तक नुकसान की भरपाई हो सकेगी.
पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के अनुसार, पिछले एक महीने में कच्चे तेल की कीमतें 70 डॉलर से बढ़कर 122 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं. वहीं वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि यह कदम उपभोक्ताओं को महंगाई से बचाने के लिए उठाया गया है.