लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की सामाजिक मानवविज्ञानी मुकुलिका बनर्जी ने भारत की जीएसटी व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं. एक पॉडकास्ट में चर्चा के दौरान उन्होंने दावा किया कि गरीब लोग अपनी आय के मुकाबले अमीरों से ज्यादा टैक्स दे रहे हैं क्योंकि जीएसटी हर उपभोक्ता पर समान रूप से लागू होता है. उन्होंने इसे समझाने के लिए बिस्किट खरीदने वाले आम आदमी और रिक्शा चालक का उदाहरण दिया. हालांकि कई अर्थशास्त्रियों और वित्त विशेषज्ञों ने उनके दावे को अधूरा और भ्रामक बताते हुए कहा कि भारत में रोजमर्रा की अधिकतर जरूरी चीजों पर या तो टैक्स नहीं है या बहुत कम जीएसटी लगता है.
मुकुलिका बनर्जी ने पूर्व बीबीसी पत्रकार परवेज आलम के पॉडकास्ट में कहा कि भारत में लोग टैक्स का मतलब सिर्फ इनकम टैक्स समझते हैं. उनके मुताबिक केवल तीन प्रतिशत लोग आयकर देते हैं लेकिन जीएसटी हर नागरिक से लिया जाता है. उन्होंने कहा कि गरीब व्यक्ति जब कोई सामान खरीदता है तो वह भी वही टैक्स देता है जो अमीर देता है. बनर्जी ने पारले-जी बिस्किट का उदाहरण देते हुए कहा कि एक रिक्शा चालक और एक अमीर आदमी एक ही पैकेट पर समान जीएसटी देते हैं लेकिन गरीब की आय कम होने के कारण उसके लिए टैक्स का बोझ ज्यादा हो जाता है.
India’s poorest pay higher effective tax rates than the rich, finds major new study by Prof Mukulika Banerjee of the LSE.
— Pervaiz Alam (@pervaizalam) May 27, 2026
Speaking on cine ink podcast London Vārta: New World Order, Prof Banerjee notes:
Lower-income Indians are shouldering a disproportionately heavy tax… pic.twitter.com/WrBf4vFATM
बनर्जी के बयान के बाद सोशल मीडिया और आर्थिक हलकों में तेज प्रतिक्रिया देखने को मिली. निवेश बैंकर सोमनाथ मुखर्जी ने कहा कि गरीबों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली अधिकतर चीजें टैक्स मुक्त हैं या उन पर केवल पांच प्रतिशत जीएसटी लगता है. उन्होंने कहा कि अमीरों के उपभोग में लग्जरी और महंगे उत्पाद शामिल होते हैं जिन पर ज्यादा टैक्स लगता है. रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ सुषांत सरीन ने भी बनर्जी के तर्कों की आलोचना करते हुए कहा कि अप्रत्यक्ष कर हमेशा से आय के अनुपात में गरीबों पर अधिक प्रभाव डालते हैं और यह कोई नई खोज नहीं है.
सरकार ने 2026-27 के बजट में जीएसटी 2.0 सुधार लागू किए थे. इसके तहत कई वस्तुओं पर टैक्स कम किया गया और कुछ जरूरी चीजों को पूरी तरह टैक्स मुक्त रखा गया. अनपैक्ड अनाज, दालें, फल और सब्जियों पर कोई जीएसटी नहीं है. वहीं दवाइयों, शिक्षा से जुड़े उत्पादों और जरूरी खाद्य वस्तुओं पर केवल पांच प्रतिशत टैक्स रखा गया है. सरकार का कहना है कि नई व्यवस्था का मकसद आम आदमी पर बोझ कम करना और टैक्स ढांचे को आसान बनाना है ताकि उपभोक्ताओं को राहत मिल सके.
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर भारत की टैक्स व्यवस्था को लेकर पुरानी बहस छेड़ दी है. कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि अप्रत्यक्ष करों का असर गरीबों पर ज्यादा महसूस होता है क्योंकि उनकी आय सीमित होती है. वहीं दूसरी ओर कई अर्थशास्त्री कहते हैं कि सरकार गरीबों को मुफ्त राशन, स्वास्थ्य योजनाएं और दूसरी कल्याणकारी सुविधाएं देकर संतुलन बनाने की कोशिश करती है.