मुंबई: देश के रोजगार बाजार से एक चिंताजनक खबर सामने आ रही है. ताजा जारी हुए पीएलएफएस के आंकड़ों के मुताबिक मई 2026 में भारत की बेरोजगारी दर बढ़कर 5.5 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई है. पिछले चार महीनों से इसमें लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है, जो आर्थिक मोर्चे पर एक बड़ी चुनौती की तरफ इशारा करती है. हालांकि इस पूरे संकट के बीच राहत की बात सिर्फ इतनी है कि शहरी इलाकों में स्थिति थोड़ी सुधरी है लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में काम का अकाल साफ दिखाई दे रहा है.
इस बार बेरोजगारी दर में आई उछाल की सबसे बड़ी वजह गांवों में रोजगार के हालातों का बदतर होना है. ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी का आंकड़ा अप्रैल के 4.6 प्रतिशत से सीधे उछलकर मई में 5.1 प्रतिशत पर पहुंच गया है जो पिछले एक साल का सबसे बड़ा स्तर है. इसके विपरीत शहरों में हालात थोड़े बेहतर हुए हैं और वहां बेरोजगारी दर 6.6 फीसदी से घटकर 6.4 फीसदी रह गई है. शहरों की इस थोड़ी बहुत रिकवरी ने गांवों के बड़े नुकसान को कुछ हद तक संभालने की कोशिश की है लेकिन कुल मिलाकर ग्रामीण भारत में काम की कमी साफ दिख रही है.
साल 2025 में जब से पीएलएफएस की मासिक सीरीज शुरू हुई है, तब से लेकर अब तक मई के महीने में बेरोजगारी में सबसे तेज मासिक बढ़त देखी गई है. अगर पिछले ट्रेंड को देखें तो यह आंकड़ा फरवरी में 4.8 प्रतिशत था, जो मार्च में 5.0, अप्रैल में 5.2 और अब मई में बढ़कर 5.5 प्रतिशत हो गया है. आंकड़े साफ बताते हैं कि बाजार में नई नौकरियां पैदा होने की रफ्तार बहुत ज्यादा सुस्त पड़ चुकी है. काम करने या नया काम ढूंढने वाले लोगों की संख्या यानी लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट भी 55 प्रतिशत से घटकर 54.4 प्रतिशत पर आ गया है जो कि गंभीर बात है.
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय का इस पूरे मामले पर कहना है कि मई के महीने में अक्सर आर्थिक गतिविधियों में थोड़ी सुस्ती आ जाती है जिसे एक मौसमी बदलाव माना जा सकता है. इसी वजह से श्रम संकेतकों में यह गिरावट देखने को मिली है. इस सुस्ती की सबसे भारी मार देश के उन ग्रामीण इलाकों पर पड़ी है जो मुख्य औद्योगिक केंद्रों से दूर हैं. इन सबके बावजूद, शहरों के लेबर मार्केट ने थोड़ी हिम्मत दिखाई है. शहरी बेरोजगारी दर गिरकर एक साल के अपने सबसे निचले स्तर पर आ गई है जिससे बाजार को थोड़ा सहारा जरूर मिला है.