नई दिल्ली: भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए पिछले कुछ सप्ताह उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं, लेकिन ताजा आंकड़े राहत लेकर आए हैं. भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, देश का विदेशी मुद्रा भंडार एक बार फिर मजबूती की राह पर लौट आया है. यह बढ़त ऐसे समय में हुई है जब वैश्विक बाजार में अस्थिरता का माहौल बना हुआ है और केंद्रीय बैंक स्थिति सुधारने में जुटा है.
पिछले रिपोर्टिंग सप्ताह में भारतीय मुद्रा भंडार को बड़ा झटका लगा था, जब इसमें 7.794 अरब डॉलर की कमी आई थी. उस गिरावट के बाद भंडार घटकर 690.693 अरब डॉलर रह गया था. हालांकि, 8 मई तक के नवीनतम आंकड़ों ने स्थिति को पूरी तरह बदल दिया है. अब कुल भंडार बढ़कर 696.988 अरब डॉलर हो गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह रिकवरी भारतीय अर्थव्यवस्था की बाहरी झटकों को सहने की क्षमता को दर्शाती है.
इस बार की बढ़त में सबसे बड़ा योगदान सोने के भंडार का रहा है. आरबीआई के डेटा के मुताबिक, सोने के भंडार की वैल्यू में 5.637 अरब डॉलर का इजाफा हुआ है. इस बढ़त के साथ ही देश का कुल गोल्ड रिजर्व अब 120.853 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है. सोने की कीमतों में वैश्विक बदलाव और आरबीआई की रणनीतिक खरीद ने मुद्रा भंडार के इस हिस्से को काफी मजबूती प्रदान की है, जो संकट के समय सुरक्षा कवच है.
विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा, जिसे 'फॉरेन करेंसी एसेट्स' (FCA) कहा जाता है, उसमें भी वृद्धि देखी गई है. 8 मई को समाप्त सप्ताह में FCA 562 मिलियन डॉलर बढ़कर 552.387 अरब डॉलर हो गया. इसमें डॉलर के अलावा यूरो, पाउंड और येन जैसी मुद्राएं भी शामिल होती हैं. इन मुद्राओं के मूल्य में होने वाले उतार-चढ़ाव का सीधा असर डॉलर में व्यक्त होने वाली इन परिसंपत्तियों पर पड़ता है, जो इस बार सकारात्मक रहा है.
केवल मुख्य भंडार ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से जुड़े अन्य घटकों में भी सुधार हुआ है. विशेष आहरण अधिकार (SDR) 84 मिलियन डॉलर बढ़कर 18.873 अरब डॉलर पर पहुंच गए हैं. इसके साथ ही आईएमएफ के पास भारत की आरक्षित स्थिति भी 12 मिलियन डॉलर बढ़कर 4.875 अरब डॉलर हो गई है. ये आंकड़े वैश्विक वित्तीय संस्थाओं के बीच भारत की मजबूत साख और वित्तीय तरलता को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त हैं.
फरवरी में भंडार 728.494 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर था, लेकिन पश्चिम एशिया संकट के कारण इसमें गिरावट आई थी. रुपया दबाव में था, जिसके चलते रिजर्व बैंक को डॉलर बेचकर बाजार में हस्तक्षेप करना पड़ा था. अब धीरे-धीरे स्थितियां नियंत्रण में आ रही हैं. हालांकि भू-राजनीतिक तनाव अभी भी एक चुनौती है, लेकिन मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि आरबीआई अपनी रणनीतियों से विदेशी मुद्रा के किटी को फिर से भरने में सफल हो रहा है.