बुधवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 24 जुलाई के बाद पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गईं. पश्चिम एशिया में जारी सैन्य संघर्ष और हमलों के तेज होने से कच्चे तेल की वैश्विक आपूर्ति ठप होने की चिंता गहरा गई है.
ताजा तनाव तब और बढ़ गया जब अमेरिकी सेना ने ईरान के प्रमुख तेल निर्यात केंद्र खार्ग द्वीप के पास ईरानी टैंकरों पर हमले किए. जवाब में ईरान ने जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डे और जहाजों को निशाना बनाया. इस सैन्य टकराव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाली जहाजों की आवाजाही पर गंभीर संकट मंडरा रहा है.
छह महीने से जारी इस युद्ध में संकट तब और गहरा गया जब यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के कई शहरों पर हमले किए. इससे अमेरिकी सहयोगी देश भी सीधे संघर्ष की चपेट में आ गए हैं. अगस्त की शुरुआत से अब तक तेल की कीमतों में 25% का उछाल आ चुका है, जबकि इस साल कुल मिलाकर कीमतें 60% से अधिक बढ़ चुकी हैं.
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, 100 डॉलर प्रति बैरल का स्तर केवल एक मनोवैज्ञानिक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह दुनिया भर में महंगाई और ब्याज दरों के बढ़ने की चेतावनी है. विशेष रूप से एशियाई अर्थव्यवस्थाएं, जो आयातित ईंधन पर अत्यधिक निर्भर हैं, इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकती हैं. निवेशक अब आगामी अमरीकी सीपीआई (CPI) आंकड़ों और फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति पर नजर बनाए हुए हैं.
कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें बढ़ने से भारत की अर्थव्यवस्था और आम जनता पर गहरा और सीधा प्रभाव पड़ता है. इसका मुख्य कारण यह है कि भारत अपनी ज़रूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल आयात (विदेशों से खरीद) करता है.
जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में क्रूड ऑयल महंगा होता है, तो भारत पर निम्नलिखित असर पड़ते हैं:
महंगाई में भारी बढ़ोतरी
ईंधन के दाम: पेट्रोल, डीज़ल और एलपीजी रसोई गैस की कीमतें बढ़ती हैं.
परिवहन लागत: डीज़ल महंगा होने से माल ढुलाई (लॉजिस्टिक्स) महंगी हो जाती है. इसके परिणामस्वरूप सब्जियां, फल, अनाज और दैनिक उपयोग की सभी वस्तुएं महंगी हो जाती हैं.
अन्य सामान: प्लास्टिक, केमिकल, पेंट, सिंथेटिक फाइबर और टायर जैसे उत्पाद भी पेट्रोकेमिकल्स से बनते हैं, जिससे ये भी महंगे हो जाते हैं.
आयात बिल और चालू खाता घाटा (Current Account Deficit):
तेल आयात के लिए भारत को और अधिक विदेशी मुद्रा (अमेरिकी डॉलर) खर्च करनी पड़ती है. अनुमानों के मुताबिक, कच्चे तेल में प्रति 10 डॉलर/बैरल की बढ़ोतरी से भारत का सालाना आयात बिल लगभग 12 से 15 अरब डॉलर तक बढ़ जाता है. इससे देश का चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ जाता है.
रुपये में गिरावट (Depreciation of Rupee):
तेल खरीदने के लिए डॉलर की मांग तेजी से बढ़ती है. इससे अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया कमजोर होने लगता है.
सरकारी खजाने और कंपनियों पर दबाव:
यदि सरकार पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें नहीं बढ़ाती है, तो उसे टैक्स (Excise Duty) घटाना पड़ता है या तेल कंपनियों को सब्सिडी देनी पड़ती है. इससे सरकार के पास विकास कार्यों (सड़क, अस्पताल, स्कूल आदि) के लिए बजट कम पड़ता है. अगर कंपनियां दाम नहीं बढ़ातीं, तो उन्हें भारी वित्तीय नुकसान (Under-recovery) झेलना पड़ता है.
लोन की ब्याज दरों में बढ़ोतरी (RBI Interest Rates):
महंगाई नियंत्रित करने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) रेपो रेट बढ़ा सकता है, जिससे कार लोन, होम लोन और पर्सनल लोन की EMIs महंगी हो जाती हैं.
ऐसा क्यों होता है? (मूल कारण)
1. अत्यधिक विदेशी निर्भरता: भारत खुद बहुत कम तेल का उत्पादन करता है. घरेलू मांग का 85%+ हिस्सा मध्य-पूर्व (खाड़ी देशों), रूस और अमेरिका जैसे देशों से आयात होता है.
2. इनपुट कॉस्ट (मूलभूत लागत): आधुनिक अर्थव्यवस्था का ढांचा पूरी तरह ऊर्जा और परिवहन पर टिका है. जब ऊर्जा का मुख्य स्रोत महंगा होता है, तो पूरी सप्लाई चेन की लागत अपने-आप बढ़ जाती है.
3. डॉलर में व्यापार: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चा तेल अमेरिकी डॉलर में खरीदा जाता है. तेल महंगा होने का मतलब है देश से डॉलर का बाहर जाना, जो मुद्रा दर को सीधे प्रभावित करता है.