हिमाचल से खिचड़ी मांगकर गोरखपुर पहुंचे थे बाबा गोरखनाथ, जानें मकर संक्रांति का सबसे बड़ा प्रतीक कैसे बना यह मंदिर

मकर संक्रांति पर गोरखपुर का गोरखनाथ मंदिर खिचड़ी मेले के लिए देशभर में जाना जाता है. खिचड़ी यहां सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा का प्रतीक है.

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Reepu Kumari

नई दिल्ली: खिचड़ी कभी साधारण भोजन मानी जाती है, तो कभी रोगी के लिए उत्तम आहार. भारतीय संस्कृति में यह सात्विकता और संयम का प्रतीक रही है. समय के साथ खिचड़ी ने धार्मिक स्वरूप भी ग्रहण किया और कई मंदिरों में यह प्रसाद और भोग का अहम हिस्सा बन गई.

गोरखपुर का गोरखनाथ मंदिर इस परंपरा का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है. यहां सदियों से मकर संक्रांति पर खिचड़ी चढ़ाई जाती है. यही परंपरा आगे चलकर खिचड़ी मेले का रूप ले चुकी है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु शामिल होते हैं.

मंदिरों में खिचड़ी का धार्मिक महत्व

ओडिशा के जगन्नाथ मंदिर में भगवान को खिचड़ी का भोग लगता है. उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, हिमाचल के ज्वाला देवी मंदिर, झारखंड के अंबाजी मंदिर और बिहार के कई शक्तिपीठों में खिचड़ी बलि के साथ या उसके स्थान पर प्रसाद के रूप में चढ़ाई जाती है. बड़े पैमाने पर श्रद्धालुओं को खिचड़ी प्रसाद वितरित किया जाता है.

गोरखपुर का खिचड़ी मेला

खिचड़ी की बात आते ही गोरखनाथ मंदिर के खिचड़ी मेले का नाम लिया जाता है. यूपी के सीएम महंत योगी आदित्यनाथ गोरखपुर की राजनीति से निकलकर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. गोरखनाथ मंदिर लंबे समय से पूर्वांचल की राजनीति और सामाजिक चेतना का अहम केंद्र रहा है. यह मंदिर लंबे समय से धार्मिक ही नहीं, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी केंद्र रहा है. यहां खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा सदियों पुरानी है, जिसने गोरखपुर को मकर संक्रांति का प्रमुख तीर्थ बना दिया है.

बाबा गोरखनाथ और नाथ संप्रदाय

बाबा को सात्विक जीवन और योग साधना का प्रतीक माना जाता है. यहां उन्हीं को खिचड़ी अर्पित की जाती है. बाबा गोरखनाथ का प्रभाव नेपाल के राजवंश तक रहा और नेपाल के राजपरिवार से भी यहां खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा लंबे समय तक चली.

ज्वालाजी मंदिर से जुड़ी कथा

गोरखनाथ मंदिर का सीधा संबंध हिमाचल प्रदेश के मां ज्वाला जी मंदिर से जोड़ा जाता है. कथा के अनुसार बाबा गोरखनाथ मां ज्वाला धाम पहुंचे, जहां देवी बलि स्वीकार करती थीं. बाबा ने कहा कि वह सात्विक भोजन करते हैं. तब माता ने दाल-चावल लाने को कहा और खिचड़ी बनाने के लिए पानी उबालने लगीं.

उबलते जल और प्रतीक्षा की मान्यता

मान्यता है कि ज्वालाजी मंदिर के पास स्थित गोरखडिब्बी में आज भी खिचड़ी के लिए पानी उबल रहा है. बाबा गोरखनाथ खिचड़ी मांगते हुए गोरक्षपुरी पहुंचे और वहीं समाधि में बैठ गए. उनका खप्पर वहीं रह गया, जिसमें खिचड़ी चढ़ाई जाती है. माना जाता है कि वह खप्पर आज तक नहीं भरा और मां ज्वाला आज भी अपने भक्त की प्रतीक्षा कर रही हैं.