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नवजात शिशु जन्म लेते ही क्यों रोता है? गरुड़ पुराण में छिपा है गहरा रहस्य

जन्म लेते ही क्यों रोते हैं नवजात शिशु? गरुड़ पुराण के अनुसार इसकी वजह सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि आत्मा, गर्भवास की स्मृति और माया से जुड़ा गहरा आध्यात्मिक रहस्य भी माना गया है खास.

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Edited By: Reepu Kumari
नवजात शिशु जन्म लेते ही क्यों रोता है? गरुड़ पुराण में छिपा है गहरा रहस्य
Courtesy: Pinterest

नई दिल्ली: जन्म लेते ही क्यों रोते हैं नवजात शिशु? यह सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है. विज्ञान के अनुसार बच्चे का जन्म के तुरंत बाद रोना उसके फेफड़ों के सक्रिय होने और सांस लेने की प्रक्रिया शुरू होने का संकेत माना जाता है. हालांकि, धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यताओं में नवजात की पहली चीख को अलग नजरिए से देखा गया है. गरुड़ पुराण में जन्म और आत्मा के संबंध को लेकर कई गहरी बातें बताई गई हैं.

गर्भ में आत्मा के जागरूक होने की मान्यता

गरुड़ पुराण की मान्यताओं के अनुसार, जीवात्मा जन्म से पहले गर्भ में अपने कर्मों और पिछले जीवन से जुड़े अनुभवों को समझती है. गर्भावस्था को आत्मा के लिए एक ऐसी अवस्था माना गया है, जहां वह सांसारिक जीवन से अलग होकर अपने कर्मों पर विचार करती है.

धार्मिक मान्यता में यह भी कहा जाता है कि गर्भ में जीव को अपने पूर्व कर्मों का बोध रहता है. वह जन्म के बाद बेहतर जीवन जीने और गलत कर्मों से बचने का संकल्प लेने की स्थिति में होती है. हालांकि, ये बातें धार्मिक ग्रंथों की मान्यताओं पर आधारित हैं, इन्हें वैज्ञानिक तथ्य नहीं माना जाना चाहिए.

जन्म का समय क्यों माना गया कष्टकारी?

गरुड़ पुराण से जुड़ी व्याख्याओं में जन्म को आत्मा के लिए एक बड़े परिवर्तन के रूप में देखा गया है. गर्भ से बाहर आने के साथ ही जीव एक नए शरीर और पूरी तरह अलग वातावरण में प्रवेश करता है. इसी बदलाव को आध्यात्मिक दृष्टि से कष्ट और बेचैनी से जोड़कर देखा जाता है. मान्यता के अनुसार, नवजात की पहली चीख इसी परिवर्तन की प्रतीक हो सकती है. गर्भ की सीमित और सुरक्षित अवस्था से बाहर आने के बाद उसे प्रकाश, हवा और बाहरी वातावरण का सामना करना पड़ता है. धार्मिक नजरिए में यह आत्मा के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत है.

माया के प्रभाव से मिट जाती हैं पुरानी स्मृतियां

हिंदू धार्मिक दर्शन में माया को सांसारिक मोह और भ्रम से जोड़कर देखा जाता है. मान्यता है कि जन्म के बाद जीव पर माया का प्रभाव बढ़ता जाता है और पूर्व जन्म की स्मृतियां धीरे-धीरे विस्मृत हो जाती हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार, यदि व्यक्ति को अपने पिछले जन्म की सभी घटनाएं और अनुभव याद रहें, तो वर्तमान जीवन को सामान्य रूप से जीना कठिन हो सकता है. इसलिए प्रकृति की व्यवस्था के तहत पुरानी स्मृतियों पर पर्दा पड़ जाता है और मनुष्य अपने नए जीवन, रिश्तों और कर्मों से जुड़ता चला जाता है.

पहली चीख का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

नवजात की पहली चीख को आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो इसे एक पुराने अनुभव से अलग होकर नए जीवन में प्रवेश का संकेत माना जाता है. यह ऐसी अवस्था का प्रतीक बताई जाती है, जिसमें जीव एक परिचित स्थिति छोड़कर अनजानी दुनिया में आता है. दूसरी ओर, चिकित्सा विज्ञान में बच्चे का जन्म के बाद रोना बेहद सामान्य और महत्वपूर्ण शारीरिक प्रक्रिया है. रोने से नवजात के फेफड़ों में हवा पहुंचती है और सांस लेने की प्रक्रिया व्यवस्थित होने लगती है. इसलिए धार्मिक व्याख्या और वैज्ञानिक कारण को अलग-अलग संदर्भों में समझना जरूरी है.

नए जीवन की शुरुआत से जुड़ी मान्यता

गरुड़ पुराण की आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुसार, जन्म केवल शरीर के दुनिया में आने की घटना नहीं है, बल्कि आत्मा के लिए एक नए कर्म चक्र की शुरुआत भी है. माया के प्रभाव से पूर्व जीवन की स्मृतियां पीछे छूट जाती हैं और जीव वर्तमान जीवन के अनुभवों से जुड़ता है.

इस नजरिए से नवजात की पहली चीख को आत्मा के नए संसार में प्रवेश की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति माना जाता है. हालांकि, इस विषय से जुड़ी धार्मिक व्याख्याएं आस्था और शास्त्रीय मान्यताओं पर आधारित हैं. विज्ञान नवजात के रोने को मुख्य रूप से शारीरिक और जैविक प्रक्रिया के रूप में समझता है.

डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और प्रचलित आध्यात्मिक व्याख्याओं पर आधारित है. इसे वैज्ञानिक तथ्य या चिकित्सकीय सलाह न माना जाए. किसी भी विषय की विस्तृत जानकारी के लिए संबंधित विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें.