रक्षाबंधन का त्योहार भाई बहन के रिश्ते में स्नेह, भरोसे और सुरक्षा की भावना को मजबूत करता है. इस दिन बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है और उसके सुखी जीवन की कामना करती है, जबकि भाई उसकी रक्षा का संकल्प लेता है. समय के साथ यह पर्व केवल भाई बहन तक सीमित नहीं रहा. कई जगह रक्षा सूत्र नई वस्तुओं, वाहनों और पशुओं को भी बांधा जाता है. इसके पीछे धार्मिक परंपराओं के साथ कई तरह की मान्यताएं जुड़ी हुई हैं.
राखी बांधने की परंपरा को लेकर भगवान कृष्ण और द्रौपदी की कथा सबसे ज्यादा प्रचलित है. मान्यता है कि राजसूय यज्ञ के दौरान कृष्ण की उंगली पर चोट लगने पर द्रौपदी ने अपने वस्त्र का एक हिस्सा फाड़कर उनकी कलाई पर बांध दिया था. इसके बाद दोनों के बीच रक्षा और स्नेह का भाव और मजबूत हुआ. इसी कथा को रक्षाबंधन की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है.
एक अन्य पौराणिक कथा में इंद्र की पत्नी शचि का उल्लेख मिलता है. मान्यता के अनुसार देवासुर संग्राम के दौरान शचि ने इंद्र की सुरक्षा की कामना से उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था. इसी कारण युद्ध या किसी कठिन कार्य पर जाने वाले व्यक्ति की कलाई पर मौली बांधने की परंपरा भी बताई जाती है. देवी लक्ष्मी और राजा बलि से जुड़ी कथा में भी रक्षा बंधन का उल्लेख मिलता है.
रक्षा सूत्र को लेकर कई स्थानों पर अलग-अलग परंपराएं देखने को मिलती हैं. घर में लाई गई नई वस्तु या वाहन पर भी रक्षा सूत्र बांधा जाता है. कुछ परिवारों में पशुओं की सुरक्षा की कामना से उन्हें भी राखी बांधने की परंपरा है. इसका मूल भाव किसी व्यक्ति, वस्तु या जीव की रक्षा और मंगलकामना से जुड़ा हुआ माना जाता है. इस तरह त्योहार का दायरा पारिवारिक रिश्ते से आगे बढ़ जाता है.
मौली या कलावा बांधने को धार्मिक रूप से शुभ माना जाता है. मान्यता है कि इसे धारण करने से त्रिदेव और देवियों की कृपा प्राप्त होती है तथा मन में सकारात्मकता बनी रहती है. पारंपरिक मान्यताओं में कलाई पर मौली बांधने को शरीर के संतुलन और स्वास्थ्य से भी जोड़ा गया है. हालांकि ऐसे स्वास्थ्य संबंधी दावों को आधुनिक चिकित्सा का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए. रक्षाबंधन का मूल संदेश प्रेम, विश्वास और सुरक्षा ही है.