menu-icon
India Daily

जब एक चिट्ठी से हिल गई सत्ता! इंदिरा गांधी से वाजपेयी तक, इन पत्रों ने बदल दी आजाद भारत की राजनीति

इंदिरा गांधी से जैल सिंह और मोरारजी देसाई से अटल बिहारी वाजपेयी तक, भारतीय राजनीति में कई चिट्ठियां सत्ता संघर्ष की गवाह बनीं. किसी ने संकट बढ़ाया, किसी ने सरकार का अंत दर्ज किया.

KanhaiyaaZee
जब एक चिट्ठी से हिल गई सत्ता! इंदिरा गांधी से वाजपेयी तक, इन पत्रों ने बदल दी आजाद भारत की राजनीति
Courtesy: AI Generated

भारतीय राजनीति में सत्ता के बड़े फैसले हमेशा संसद के भाषणों या चुनावी रैलियों से तय नहीं हुए, बल्कि कई बार एक चिट्ठी ने ऐसा राजनीतिक तूफान खड़ा किया कि प्रधानमंत्री की कुर्सी तक हिल गई. कभी राष्ट्रपति को लिखी चिट्ठी ने आधी रात में देश में आपातकाल की जमीन तैयार की, तो कभी प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बीच लिखे पत्र ने संवैधानिक संकट को सार्वजनिक बहस बना दिया.

आजाद भारत के राजनीतिक इतिहास में ऐसे कई मौके आए, जब पत्र महज संवाद का माध्यम नहीं रहे. वे सत्ता संघर्ष के दस्तावेज बन गए. किसी चिट्ठी ने सरकार के भीतर छिपे मतभेद सामने ला दिए, किसी ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के रिश्तों में तनाव को सार्वजनिक कर दिया और किसी ने सरकार के इस्तीफे को औपचारिक रूप दे दिया.

25 जून 1975 की वह चिट्ठी, जिसके बाद आधी रात में लगा आपातकाल

आजाद भारत में किसी प्रधानमंत्री की चिट्ठी का सबसे गंभीर राजनीतिक प्रभाव शायद 25 जून 1975 की उस चिट्ठी में दिखाई देता है, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को लिखा था.

उस रात देश की राजनीति असाधारण तनाव से गुजर रही थी. इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद इंदिरा गांधी की राजनीतिक स्थिति चुनौती में थी. जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में विपक्षी आंदोलन तेज हो चुका था और सरकार के खिलाफ देशव्यापी राजनीतिक दबाव बढ़ रहा था.

इसी माहौल में इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति को एक गोपनीय पत्र भेजा. शाह आयोग से संबंधित दस्तावेजों में दर्ज पत्र के अनुसार, इंदिरा गांधी ने लिखा कि उन्हें ऐसी सूचना मिली है जिससे देश की सुरक्षा को आंतरिक अशांति से खतरा बताया जा रहा है. उन्होंने राष्ट्रपति से संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल घोषित करने की सिफारिश की. पत्र में यह भी कहा गया था कि वह मामले को उसी रात मंत्रिमंडल के सामने नहीं रख पा रही थीं और अगले दिन मंत्रिमंडल को इसकी जानकारी दी जाएगी.

राष्ट्रपति ने उसी रात आपातकाल की घोषणा पर हस्ताक्षर कर दिए. यानी जिस फैसले का प्रभाव पूरे देश पर पड़ना था, उसकी संवैधानिक प्रक्रिया आधी रात के आसपास एक पत्र के जरिए आगे बढ़ी.

दिलचस्प बात यह है कि उस समय मंत्रिमंडल की औपचारिक बैठक बाद में हुई. यही कारण है कि 25 जून 1975 की यह चिट्ठी आज भी भारतीय लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक दस्तावेजों में गिनी जाती है.

चिट्ठी ने क्या बदला?

चिट्ठी अपने आप में आपातकाल नहीं थी. संवैधानिक रूप से राष्ट्रपति की घोषणा जरूरी थी और उसके बाद मंत्रिमंडलीय प्रक्रिया भी हुई. लेकिन उस पत्र ने राष्ट्रपति के सामने प्रधानमंत्री की तत्काल सिफारिश रखी और उसी रात आपातकाल लागू करने की प्रक्रिया शुरू हुई.

मोरारजी देसाई और चरण सिंह: चिट्ठियों से खुलने लगी जनता सरकार की दरार

अगर किसी राजनीतिक सरकार के अंदरूनी झगड़े को पत्रों ने सार्वजनिक बहस में बदल दिया था, तो उसका बड़ा उदाहरण 1978 की जनता पार्टी सरकार है.

1977 में इंदिरा गांधी को हराकर सत्ता में आई जनता पार्टी कई राजनीतिक धाराओं का गठबंधन थी. मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने, जबकि चौधरी चरण सिंह गृह मंत्री थे. शुरुआत में दोनों साथ थे, लेकिन जल्दी ही मतभेद सामने आने लगे.

सबसे महत्वपूर्ण विवादों में एक था मोरारजी देसाई के बेटे कांति देसाई के खिलाफ लगे आरोपों की जांच का सवाल. 11 मार्च 1978 को चरण सिंह ने मोरारजी देसाई को पत्र लिखकर कांति देसाई के खिलाफ जांच आयोग बनाने की मांग की. मोरारजी देसाई ने इसका जवाब दिया और मांग स्वीकार नहीं की. इसके बाद दोनों के बीच कई पत्रों का आदान-प्रदान हुआ. उपलब्ध अभिलेखों में इस पत्राचार का विवरण दर्ज है.

यह सिर्फ दो नेताओं के बीच निजी पत्राचार नहीं रहा. धीरे-धीरे यह जनता पार्टी के भीतर नेतृत्व, नैतिकता और सत्ता के सवाल का हिस्सा बन गया.

फिर आया जून 1978 का बड़ा टकराव. जून 1978 में मोरारजी देसाई ने चरण सिंह और राज नारायण से मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने को कहा. इस संबंध में दोनों नेताओं को पत्र भेजे गए. समकालीन रिपोर्टों के अनुसार इन पत्रों को कैबिनेट की कार्रवाई के बाद भेजा गया था और दोनों से इस्तीफा मांगा गया था. इसके बाद जनता पार्टी में संकट और गहरा गया.

चरण सिंह ने पार्टी नेतृत्व को पत्र लिखकर भी अपना विरोध दर्ज कराया था. अप्रैल 1978 में उन्होंने जनता पार्टी अध्यक्ष चंद्रशेखर को पत्र लिखकर पार्टी की कार्यप्रणाली और विभिन्न राज्यों में पार्टी के भीतर चल रही गतिविधियों पर सवाल उठाए थे. यानी जनता पार्टी के अंदर की राजनीतिक लड़ाई अब सिर्फ बैठकों और बयानों तक सीमित नहीं थी. चिट्ठियां राजनीतिक हथियार बन चुकी थीं.

संसद तक पहुंच गया पत्र विवाद

मामला तब और दिलचस्प हो गया जब प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के बीच हुए पत्राचार के सार्वजनिक होने पर संसद में सवाल उठने लगे. राज्यसभा की कार्यवाही के रिकॉर्ड में भी उस समय के पत्रों और उनके सार्वजनिक होने को लेकर बहस दर्ज है. सांसदों ने प्रधानमंत्री और चरण सिंह के बीच हुए पत्राचार को सदन में रखने की मांग की थी.

यह एक बड़ा राजनीतिक संकेत था, क्योंकि सरकार के भीतर होने वाली बातचीत आमतौर पर गोपनीय मानी जाती है. जब वही पत्र सार्वजनिक होने लगे, तो सरकार के अंदर का संघर्ष जनता और संसद के सामने खुलकर आने लगा.

एक पत्र ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के रिश्ते को राष्ट्रीय बहस बना दिया

अब आते हैं उस चिट्ठी पर, जिसने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बीच संवैधानिक रिश्तों को लेकर देश में बड़ा सवाल खड़ा कर दिया. साल था 1987, प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे और राष्ट्रपति थे ज्ञानी जैल सिंह. दोनों के रिश्ते पहले से तनावपूर्ण बताए जा रहे थे. बोफोर्स विवाद और सरकार के खिलाफ बढ़ते राजनीतिक आरोपों के बीच केंद्र की राजनीति में माहौल तेजी से बदल रहा था.

9 मार्च 1987 को राष्ट्रपति जैल सिंह ने राजीव गांधी को एक निजी पत्र लिखा. पत्र में उन्होंने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच संवैधानिक परंपराओं और संवाद का सवाल उठाया. उन्होंने शिकायत की कि पिछले दो वर्षों में स्थापित परंपराओं का पालन नहीं हुआ और उन्हें यह समझने में कठिनाई हो रही है कि सरकार संविधान की भावना के अनुरूप काम कर रही है या नहीं. बाद में यह पत्र सार्वजनिक हो गया और 13 मार्च को इंडियन एक्सप्रेस के पहले पन्ने पर छपा. यहीं से मामला असाधारण हो गया. राष्ट्रपति की ओर से प्रधानमंत्री को लिखा गया एक निजी पत्र अब राष्ट्रीय राजनीतिक दस्तावेज बन चुका था.

क्या राष्ट्रपति राजीव गांधी को हटा सकते थे?

यही सवाल उस समय राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में आ गया. राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच संवैधानिक अधिकारों और सूचनाओं के आदान-प्रदान को लेकर बहस शुरू हुई. विपक्ष ने सरकार पर निशाना साधा और राष्ट्रपति के पत्र को राजीव गांधी सरकार के खिलाफ गंभीर संकेत के रूप में देखा. जैल सिंह का पत्र अपने आप राजीव गांधी सरकार को गिराने वाला दस्तावेज नहीं बना.

राजीव गांधी प्रधानमंत्री पद पर बने रहे और 1989 के लोकसभा चुनाव तक उनकी सरकार चलती रही, लेकिन उस पत्र ने एक ऐसी संवैधानिक बहस को सार्वजनिक कर दिया, जिसे सामान्य परिस्थितियों में राष्ट्रपति भवन और प्रधानमंत्री कार्यालय के बीच सीमित रहना था. यही उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत थी.

मोरारजी देसाई का इस्तीफा भी एक चिट्ठी के जरिए इतिहास में दर्ज हुआ

1979 में जनता पार्टी का संकट चरम पर पहुंच गया. चौधरी चरण सिंह के अलग होने के बाद मोरारजी देसाई सरकार बहुमत के संकट में फंस गई. 15 जुलाई 1979 को उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. संसद के डिजिटल अभिलेख में प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिपरिषद के इस्तीफे तथा राष्ट्रपति द्वारा उसे स्वीकार किए जाने से संबंधित पत्र दर्ज हैं.

लेकिन इसी दौर में एक और दिलचस्प पत्र सामने आया. जनता पार्टी के भीतर नेतृत्व संघर्ष के दौरान मोरारजी देसाई ने पार्टी नेतृत्व को अपना इस्तीफा सौंपते हुए राजनीतिक गतिविधियों से दूर होने की बात तक कही थी. उस पत्र में उन्होंने उन परिस्थितियों पर नैतिक जिम्मेदारी लेने की बात कही जिनमें उनके समर्थकों की सूची को लेकर विवाद खड़ा हुआ था.

अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार: जब इस्तीफे की चिट्ठी ने सत्ता परिवर्तन दर्ज किया

अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे और एनडीए सरकार संकट में थी. जयललिता की एआईएडीएमके ने समर्थन वापस ले लिया था. सरकार को लोकसभा में विश्वास मत का सामना करना पड़ा. 17 अप्रैल 1999 को वाजपेयी सरकार सिर्फ एक वोट से विश्वास मत हार गई. इसके बाद प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति को अपना और मंत्रिपरिषद का इस्तीफा सौंप दिया.

संसद के आधिकारिक डिजिटल रिकॉर्ड में 17 अप्रैल 1999 की वह चिट्ठी दर्ज है, जिसमें वाजपेयी ने राष्ट्रपति को अपना और अपने मंत्रियों का इस्तीफा सौंपा था. राष्ट्रपति ने इस्तीफा स्वीकार करते हुए उन्हें वैकल्पिक व्यवस्था होने तक पद पर बने रहने को कहा था.