नई दिल्ली: पितृ दोष का नाम सुनते ही कई लोग परेशान हो जाते हैं. आम धारणा है कि पूर्वजों की नाराजगी या श्राद्ध में हुई गलती के कारण जीवन में परेशानियां आती हैं. लेकिन क्या माता-पिता के जीवित रहते भी पितृ दोष हो सकता है. ज्योतिष के अनुसार कुंडली में पितृ संबंधी योग जन्म के समय ही बनते हैं. माता-पिता जीवित हैं या नहीं, इससे कुंडली में बने योग में बदलाव नहीं होता.
शास्त्रों में जीवित माता-पिता के सम्मान को बहुत महत्व दिया गया है. तैत्तिरीय उपनिषद में कहा गया है, मातृदेवो भव और पितृदेवो भव. इसका अर्थ है कि माता और पिता को देवता के समान सम्मान देना चाहिए. इसी तरह देवताओं और पितरों से जुड़े कर्तव्यों की उपेक्षा न करने की शिक्षा भी दी गई है.
वैदिक ज्योतिष में सूर्य को पिता और वंश की प्रतिष्ठा का कारक माना जाता है. नवम भाव पिता, गुरु, धर्म और कुल परंपरा से जुड़ा माना जाता है. वहीं पंचम भाव पूर्व पुण्य, संतान और वंश की अगली कड़ी का संकेत देता है. पितृ संबंधी योग देखने के लिए नवम भाव, नवमेश, सूर्य, पंचम भाव, पंचमेश और राहु, केतु, शनि तथा मंगल के प्रभाव का अध्ययन किया जाता है.
ज्योतिष में पितृ शाप से जुड़े कुछ विशेष योगों का भी उल्लेख मिलता है. हालांकि केवल सूर्य के साथ राहु होने या नवम भाव में किसी अशुभ ग्रह के बैठने से पितृ दोष घोषित करना सही नहीं माना जा सकता. पूरी कुंडली और ग्रहों की दशा का अध्ययन जरूरी होता है.
वहीं माता-पिता का अपमान, उनकी उपेक्षा या जरूरत के समय साथ नहीं देना पितृ ऋण से जुड़ा कर्म माना जा सकता है. श्राद्ध और पूजा करना अपनी जगह है, लेकिन जीवित माता-पिता से सम्मान से बात करना, उनकी जरूरतों का ध्यान रखना और बीमारी या परेशानी में साथ देना भी महत्वपूर्ण है.
पितृ संबंधी बाधा के लिए अमावस्या पर तर्पण, पितृपक्ष में श्राद्ध, अन्नदान और जरूरतमंद बुजुर्गों की सहायता जैसे धार्मिक उपाय किए जाते हैं. हालांकि इन उपायों के साथ अपने व्यवहार पर ध्यान देना भी जरूरी है.
इसलिए पितृ दोष के नाम से डरने के बजाय पहले अपने कर्म और पारिवारिक व्यवहार को देखना चाहिए. माता-पिता का सम्मान, सेवा और जिम्मेदारियों का निर्वहन पितृ ऋण के प्रति सबसे सहज और महत्वपूर्ण कर्तव्य माना जा सकता है.