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Rukmini Ashtami 2024: जानें कब है रुक्मिणी जयंती और क्या है इस दिन का पूजा मुहूर्त? 

Rukmini Ashtami 2024: देवी लक्ष्मी की स्वरूप और भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी रुक्मिणी देवी की जयंती को रुक्मिणी अष्टमी के नाम से जाना जाता है. 

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Mohit Tiwari

Rukmini Ashtami 2024: भगवान श्रीकृष्ण की प्रमुख पटरानी रुक्मिणी देवी का जन्म पौष माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था. इस कारण इस दिन रुक्मिणी अष्टमी मनाई जाती है. इस दिन भगवान श्रीकृष्ण और देवी रुक्मिणी का पूजन करने से जीवन में सुख-समृद्धि और धन संपदा आती है. इसके साथ ही देवी रुक्मिणी को माता लक्ष्मी का अवतार भी कहा जाता है. हर साल कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कालाष्टमी भी मनाते हैं. 

कब है साल 2024 में रुक्मिणी अष्टमी?

साल 2024 में पौष माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी 4 जनवरी 2024 गुरुवार को पड़ रही है. इस कारण इस दिन रुक्मिणी अष्टमी और कालाष्टमी दोनों ही मनाई जाएगी. इस दिन पूजन करने से आर्थिक संकट नहीं आता है और दांपत्य जीवन भी खुशहाल रहता है. 

हिंदू पंचांग के अनुसार पौष माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 3 जनवरी 2024 की रात 07 बजकर 48 मिनट से शुरू होगी और यह अगले दिन 4 जनवरी 2024 को रात 10 बजकर 04 मिनट तक रहेगी. इस कारण इस दिन का पूजा मुहूर्त सुबह 07:15 से सुबह 08:32 तक रहेगा. 

रुक्मिणी अष्टमी की पूजा विधि

इस दिन जल्दी उठकर स्नान करें. इसके बाद पूजा स्थल पर भगवान श्रीकृष्ण और माता रुक्मिणी की तस्वीर लगाएं. इसके बाद दक्षिणावर्ती शंख से श्रीकृष्ण और रुक्मिणी देवी का अभिषेक करें. अभिषेक में केसर मिश्रित दूध का उपयोग करें. इसके साथ ही देवी रुक्मिणी को लाल वस्त्र, इत्र, हल्दी और कुमकुम अर्पित करें.

इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और मिश्री मिलाकर पंचामृत बनाएं और इसका भगवान श्रीकृष्ण और देवी रुक्मिणी को भोग लगाएं. पूजा में कृं कृष्णाय नमः मंत्र का जाप करें. पूजा के अंत में गाय के घी का दीपक जलाएं. इसके साथ ही कपूर से आरती करें. इस दिन ब्राह्मणों को भोजन भी कराएं. मान्यता है कि इससे देवी लक्ष्मी का आशीर्वाद मिलता है. इस दिन सुहागिन महिलाओं को सुहाग की सामग्री भेंट करना भी शुभ होता है. इससे धन और सौभाग्य में वृद्धि होती है. 

रुक्मिणी ने बताया था प्रेम का महत्व

श्रीमद्भागवत के अनुसार, एक बार भगवान श्रीकृष्ण की तीसरी पत्नी सत्यभामा को शंका हुई कि वे रुक्मिणी को ज्यादा प्रेम करते हैं. इस कारण श्रीकृष्ण की प्रिय बनने के लिए सत्यभामा ने एक यज्ञ आयोजित किया. अंत में नारद जी ने दक्षिणा के रूप में श्रीकृष्ण को ही मांग लिया, तो सत्यभामा ने ऐसा करने से मना कर दिया. इस पर नारद जी ने बोला कि अगर आप श्रीकृष्ण को नहीं दे सकती हैं तो श्रीकृष्ण के बराबर सोना दान कर दें. 

सत्यभामा अहंकार में चूर थीं. उन्होंने अपना सारा सोना भी श्रीकृष्ण के बराबर तौल दिया, लेकिन फिर भी कान्हा जी का पलड़ा भारी रहा. इस पर सत्यभामा ने रुक्मिणी से मदद मांगी. देवी रुक्मिणी ने प्रेमपूर्वक एक तुलसी का पत्ता तराजू की दूसरी ओर रख दिया. इस प्रकार तुला का दान संपन्न हुआ. देवी रुक्मिणी ने सत्यभामा को समझाया कि प्रेम सच्चे मन से किया जाता है और प्रेम में अभिमान का कोई महत्व नहीं है.