नई दिल्ली: कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को तुलसी विवाह का पावन पर्व मनाया जाता है. इस दिन तुलसी माता का विवाह भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप से कराया जाता है. मान्यता है कि तुलसी विवाह करने से जीवन में शुभ फल प्राप्त होते हैं, विवाह संबंधी बाधाएं दूर होती हैं और वैवाहिक जीवन में सुख-शांति आती है. इस वर्ष तुलसी विवाह 2 नवंबर 2025 को मनाया जाएगा. ज्योतिषियों के अनुसार, इस दिन द्वादशी तिथि पर ही विवाह करना शुभ माना गया है.
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव ने अपना तेज समुद्र में फेंक दिया, जिससे एक तेजस्वी बालक का जन्म हुआ. वही बालक आगे चलकर दैत्यराज जालंधर बना. जालंधर का विवाह दैत्यराज कालनेमी की पुत्री वृंदा से हुआ, जो अत्यंत पतिव्रता स्त्री थी. वृंदा के सतीत्व के बल से जालंधर को कोई देवता पराजित नहीं कर पाता था.
एक बार जालंधर ने अपनी शक्ति के अहंकार में देवताओं पर आक्रमण किया. उसे पराजित करने के लिए भगवान विष्णु ने एक योजना बनाई. उन्होंने ऋषि का रूप धारण कर वृंदा के पास पहुंचे. जब उन्होंने अपनी माया से वृंदा को यह भ्रम दिलाया कि उसका पति मर गया है, तब वह दुखी होकर मूर्छित हो गईं. भगवान विष्णु ने जालंधर का रूप धारण किया और वृंदा का सतीत्व भंग हो गया. उसी क्षण जालंधर युद्ध में मारा गया.
जब वृंदा को यह छल पता चला, तो उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप दिया कि वे शिला रूप में परिवर्तित हो जाएं. यह श्राप तुरंत प्रभावी हुआ और भगवान विष्णु शालिग्राम पत्थर बन गए. देवताओं ने वृंदा से विनती की कि वे श्राप वापस लें. तब वृंदा ने भगवान को श्राप से मुक्त किया और स्वयं अग्नि में समा गईं. जहां वृंदा की राख गिरी, वहीं तुलसी का पौधा उग आया. भगवान विष्णु ने कहा, 'हे वृंदा, तुम्हारे सतीत्व के कारण तुम मुझे लक्ष्मी से भी प्रिय हो. अब से तुम तुलसी के रूप में सदा मेरे साथ रहोगी.'
इस दिन घर-घर में तुलसी और शालिग्राम की पूजा बड़े विधि-विधान से की जाती है. तुलसी मंडप सजाया जाता है, दीपक जलाए जाते हैं और विवाह की पूरी प्रक्रिया संपन्न की जाती है. मान्यता है कि तुलसी विवाह कराने से व्यक्ति को वैसा ही पुण्य मिलता है जैसा कन्यादान से मिलता है. इस दिन व्रत रखकर कथा सुनने और पूजा करने से सुख, समृद्धि और शांति का आशीर्वाद प्राप्त होता है.
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