क्या रावण ने अपने 9 सिर काटकर भगवान शिव को किए थे अर्पित? जानिए बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की पौराणिक कथा

पौराणिक मान्यता के अनुसार रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अपने सिर अर्पित किए थे. शिवजी ने प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया और शिवलिंग लंका ले जाने की अनुमति दी लेकिन रास्ते में शिवलिंग देवघर में स्थापित हो गया.

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नई दिल्ली: सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र माना जाता है. इस दौरान शिव भक्त व्रत, पूजा और जलाभिषेक कर महादेव का आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रयास करते हैं. पौराणिक मान्यताओं में लंकापति रावण को भी भगवान शिव का परम भक्त माना गया है. इसी भक्ति से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना से जुड़ी हुई है.

पौराणिक कथाओं के अनुसार रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की. कहा जाता है कि उसने एक एक करके अपने सिर भगवान शिव को अर्पित करना शुरू कर दिया. जब वह दसवां सिर अर्पित करने वाला था, तब भगवान शिव उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर प्रकट हुए. उन्होंने रावण को उसके सभी सिर वापस प्रदान किए और मनचाहा वर मांगने को कहा.

भगवान शिव ने क्या रखा शर्त?

रावण ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे उसके साथ लंका चलें. भगवान शिव ने उसकी इच्छा स्वीकार कर ली, लेकिन एक शर्त रखी. उन्होंने कहा कि उनके शिवलिंग स्वरूप को यात्रा के दौरान कहीं भी भूमि पर नहीं रखना होगा. यदि शिवलिंग जमीन पर रख दिया गया तो वह उसी स्थान पर स्थापित हो जाएगा.


क्या है कथा?

कथा के अनुसार जब रावण शिवलिंग लेकर लंका की ओर जा रहा था, तब देवताओं को चिंता हुई कि यदि शिवलिंग लंका पहुंच गया तो रावण और अधिक शक्तिशाली हो जाएगा. तब भगवान विष्णु ने एक ग्वाले का रूप धारण किया. इसी बीच रावण को लघुशंका के लिए रुकना पड़ा और उसने कुछ समय के लिए शिवलिंग ग्वाले को सौंप दिया.

क्या है मान्यता?

शिवलिंग का भार अधिक होने के कारण ग्वाले के रूप में भगवान विष्णु ने उसे भूमि पर रख दिया. जब रावण वापस लौटा तो उसने शिवलिंग को उठाने का बहुत प्रयास किया, लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ. मान्यता है कि यही स्थान आज झारखंड के देवघर में स्थित प्रसिद्ध बैद्यनाथ धाम है, जिसे भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है.

क्या है कांवड़ यात्रा का भी विशेष महत्व?

सावन के महीने में बैद्यनाथ धाम में लाखों श्रद्धालु जलाभिषेक करने पहुंचते हैं. यहां कांवड़ यात्रा का भी विशेष महत्व है. मान्यता है कि भगवान परशुराम ने सबसे पहले गंगा जल लाकर भगवान शिव का अभिषेक किया था. वहीं एक अन्य मान्यता के अनुसार श्रवण कुमार ने अपने माता पिता को कांवड़ में बैठाकर तीर्थ यात्रा कराई और गंगा जल लाकर शिवलिंग पर अर्पित किया. इसी कारण कांवड़ यात्रा को शिव भक्ति का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है.

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन में भगवान शिव की सच्चे मन से पूजा करने और जल अर्पित करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं तथा जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है.