नई दिल्ली: सावन का महीना भगवान शिव की भक्ति, व्रत और कथाओं के लिए विशेष माना जाता है. शिव पुराण में भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़े कई प्रेरक प्रसंग मिलते हैं, जो त्याग, विश्वास और भक्ति का संदेश देते हैं. इन्हीं में एक कथा ऐसी भी है, जिसमें भगवान शिव ने मगरमच्छ का रूप धारण कर माता पार्वती की परीक्षा ली. यह प्रसंग आज भी श्रद्धालुओं के बीच आस्था और समर्पण का प्रतीक माना जाता है. पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप कर रही थीं. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवताओं ने भगवान शिव से उनकी मनोकामना पूरी करने का आग्रह किया. हालांकि विवाह से पहले भगवान शिव यह जानना चाहते थे कि माता पार्वती का समर्पण कितना अडिग है. इसी उद्देश्य से उन्होंने एक विशेष लीला रची, जिसने उनकी करुणा और त्याग की सर्वोच्च परीक्षा ली.
शिव पुराण के अनुसार, सबसे पहले भगवान शिव ने सप्तर्षियों को माता पार्वती के पास भेजा. सप्तर्षियों ने भगवान शिव के कई अवगुण गिनाकर उन्हें अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने के लिए कहा. लेकिन माता पार्वती अपने संकल्प से बिल्कुल नहीं डिगीं. उनके अटल विश्वास को देखकर भगवान शिव ने स्वयं उनकी परीक्षा लेने का निश्चय किया और एक नई लीला की शुरुआत की.
कथा के अनुसार, भगवान शिव वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गए. उसी समय पास के एक तालाब में मगरमच्छ ने एक बालक को पकड़ लिया. बालक मदद के लिए पुकारने लगा. उसकी आवाज सुनकर माता पार्वती वहां पहुंचीं और मगरमच्छ से उस बालक को छोड़ने की प्रार्थना की. मगरमच्छ ने कहा कि वह अपने नियम के अनुसार मिले शिकार को नहीं छोड़ सकता.
मगरमच्छ ने माता पार्वती के सामने एक शर्त रखी. उसने कहा कि यदि वे भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए किए गए अपने वर्षों के तप का संपूर्ण फल उसे दान कर दें, तभी वह बालक को मुक्त करेगा. बिना किसी संकोच के माता पार्वती ने एक अनजान बालक की रक्षा के लिए अपने तप का फल दान करने का निर्णय ले लिया.
मगरमच्छ ने माता पार्वती को दोबारा सोचने का अवसर भी दिया और बताया कि इतना कठिन तप दोबारा करना आसान नहीं होगा. लेकिन माता पार्वती ने कहा कि तप फिर से किया जा सकता है, जबकि किसी के प्राण वापस नहीं लौटाए जा सकते. उनके इस उत्तर ने त्याग, दया और मानवता की सर्वोच्च भावना को दर्शाया.
तप का फल दान करने के बाद मगरमच्छ और बालक दोनों अचानक अदृश्य हो गए. माता पार्वती ने दोबारा तप करने का संकल्प लिया. तभी भगवान शिव प्रकट हुए और बताया कि मगरमच्छ और बालक दोनों रूप उन्होंने ही धारण किए थे. उन्होंने कहा कि यह पूरी लीला माता पार्वती की परीक्षा लेने के लिए रची गई थी और उनका समर्पण सफल रहा.
शिव पुराण में वर्णित यह प्रसंग बताता है कि सच्ची भक्ति केवल तप या पूजा तक सीमित नहीं होती, बल्कि करुणा, त्याग और दूसरों के लिए निस्वार्थ भाव भी उसका महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. माता पार्वती ने अपने तप का फल एक अजनबी बालक के प्राण बचाने के लिए त्याग दिया और यही गुण भगवान शिव को सबसे अधिक प्रिय लगा.
नोट: यहां दी गई तमाम जानकारी अलग-अलग पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है.