सावन भगवान शिव को समर्पित माना जाता है. इस पूरे महीने में शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल और शमी पत्र सहित कई चीजें अर्पित की जाती हैं. सावन पूर्णिमा के बाद जब भाद्रपद माह शुरू होता है, तो पूजा की परंपराओं में भी बदलाव आता है.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस समय पूजा घर को साफ और व्यवस्थित रखना शुभ माना जाता है. वास्तु से जुड़ी मान्यताओं में भी सावन के दौरान मंदिर में जमा हुई पुरानी पूजा सामग्री को हटाकर नए महीने की शुरुआत साफ-सुथरे पूजा घर से करने की सलाह दी जाती है.
सावन में शिवलिंग पर रोजाना चढ़ाए गए बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल और शमी पत्र अगर सूख चुके हैं या मुरझा गए हैं, तो उन्हें पूजा घर में न रखें. इन्हें सम्मानपूर्वक हटाकर गमले की मिट्टी में दबाया जा सकता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूजा में इस्तेमाल हुई सामग्री को सामान्य कचरे में फेंकने से बचना चाहिए.
शिवलिंग के अभिषेक में इस्तेमाल होने वाला जल लंबे समय तक पूजा घर में जमा नहीं रहने देना चाहिए. लोटे, शंख और पंचामृत के बर्तनों को अच्छी तरह धोकर साफ करें. खासकर तांबे और पीतल के पात्रों की अच्छी तरह सफाई कर उन्हें दोबारा पूजा के लिए तैयार किया जा सकता है.
आरती के बाद बची हुई जली बत्तियां, धूप की राख और कपूर के अवशेष मंदिर के किसी कोने में जमा करके न रखें. सावन समाप्त होने पर पूजा घर की पूरी सफाई करें और पुराने अवशेषों को सम्मानपूर्वक हटा दें. इससे मंदिर व्यवस्थित और स्वच्छ बना रहेगा.
भगवान की चौकी पर बिछा हुआ पुराना या मैला कपड़ा भी बदल देना चाहिए. सावन के दौरान इस्तेमाल किए गए पुराने रक्षासूत्र और अन्य पूजा वस्त्रों को भी पूजा घर में जमा करके न रखें. चौकी को साफ करने के बाद भादों के अनुरूप नए और साफ वस्त्र बिछाए जा सकते हैं.
भादों में भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है. ऐसे में लड्डू गोपाल की चौकी के लिए पीले, केसरिया या लाल रंग के वस्त्रों का इस्तेमाल किया जा सकता है. बाल गोपाल के झूले को साफ करके सजाएं और उनके पास मोरपंख व बांसुरी रखें.