नई दिल्ली: रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के प्रेम और विश्वास का प्रतीक माना जाता है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि पहली राखी किसने बांधी थी. पौराणिक मान्यता के अनुसार इस परंपरा की शुरुआत माता लक्ष्मी ने की थी. यह कथा भगवान विष्णु, राजा बलि और माता लक्ष्मी से जुड़ी है, जिसमें वचन, त्याग और रिश्तों की महत्ता का विशेष वर्णन मिलता है.मान्यता है कि यह घटना भगवान विष्णु के वामन अवतार के बाद की है. जब राजा बलि ने भगवान से एक विशेष वचन ले लिया, तब परिस्थितियां ऐसी बनीं कि माता लक्ष्मी को स्वयं पाताल लोक जाना पड़ा. वहीं उन्होंने राजा बलि को भाई बनाकर राखी बांधी और दक्षिणा में ऐसा वरदान मांगा, जिसने पूरी कथा की दिशा बदल दी.
पौराणिक कथा के अनुसार राजा बलि अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे. उसी समय भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण कर तीन पग भूमि मांगी. तीन पग में उन्होंने संपूर्ण सृष्टि को नाप लिया और राजा बलि को पाताल लोक का राज्य दे दिया. इसके बाद राजा बलि ने भगवान विष्णु से एक वचन मांगा, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया.
राजा बलि ने भगवान विष्णु से कहा कि जब भी वह सोएं या जागें, उनकी नजर सबसे पहले भगवान पर ही पड़े. वचन निभाने के लिए भगवान विष्णु पाताल लोक में राजा बलि के पास रहने लगे. समय बीतने पर बैकुंठ में माता लक्ष्मी भगवान विष्णु की अनुपस्थिति से चिंतित हो गईं.
माता लक्ष्मी ने नारद जी से भगवान विष्णु का पता पूछा. नारद जी ने बताया कि भगवान विष्णु राजा बलि के पास हैं. उन्होंने माता लक्ष्मी को सलाह दी कि वे राजा बलि को अपना भाई बना लें और पहले उनसे वचन लें कि वे दक्षिणा में जो मांगेंगी, वह उन्हें मिलेगा.
कथा के अनुसार माता लक्ष्मी एक साधारण स्त्री का रूप धारण कर राजा बलि के पास पहुंचीं. उन्होंने स्वयं को बिना भाई वाली महिला बताया. राजा बलि ने उन्हें अपनी धर्मबहन स्वीकार कर लिया. इसके बाद माता लक्ष्मी ने उन्हें रक्षा सूत्र बांधा और दक्षिणा में भगवान विष्णु को अपने साथ ले जाने का आग्रह किया. राजा बलि ने अपना वचन निभाते हुए यह मांग स्वीकार कर ली.
इस कथा के अनुसार रक्षाबंधन केवल रक्षा सूत्र बांधने का पर्व नहीं, बल्कि विश्वास, वचन और सम्मान का प्रतीक भी है. इसी प्रसंग से जुड़ा प्रसिद्ध मंत्र भी पढ़ा जाता है-
'येन बद्धो बलिराजा, दानवेन्द्रो महाबलः.
तेन त्वाम् प्रति बध्नामि रक्षे, मा चल मा चलः..'
मान्यता है कि यह मंत्र सुरक्षा, शुभता और रिश्तों में विश्वास का संदेश देता है.
नोट: यहां दी गई तमाम जानकारी अलग-अलग पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है.