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Janmashtami 2026: आधी रात को क्यों काटा जाता है खीरा? जानें ‘नाल छेदन’ की परंपरा और इसका महत्व

जन्माष्टमी से जुड़ी कई ऐसी परंपराएं हैं, जिनका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व बताया जाता है. इन्हीं में से एक है आधी रात को डंठल वाले खीरे को काटने की रस्म. इस परंपरा को कई जगह ‘नाल छेदन’ के रूप में देखा जाता है.

Shilpa Shrivastava
Janmashtami 2026: आधी रात को क्यों काटा जाता है खीरा? जानें ‘नाल छेदन’ की परंपरा और इसका महत्व
Courtesy: AI Generated

नई दिल्ली: हिंदू धर्म में जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का त्योहार है. इस दिन भक्त व्रत रखते हैं, रात 12 बजे कान्हा के जन्म का उत्सव मनाते हैं और लड्डू गोपाल की पूजा करते हैं. जन्माष्टमी से जुड़ी कई ऐसी परंपराएं हैं, जिनका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व बताया जाता है. इन्हीं में से एक है आधी रात को डंठल वाले खीरे को काटने की रस्म. इस परंपरा को कई जगह ‘नाल छेदन’ के रूप में देखा जाता है. चलिए जानते हैं इस परंपरा के बारे में.

खीरे को गर्भनाल का प्रतीक क्यों माना जाता है?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, डंठल लगा खीरा माता देवकी के गर्भ का प्रतीक माना जाता है. वहीं, खीरे का डंठल गर्भनाल का प्रतीक माना जाता है. मान्यता है कि जिस तरह बच्चे के जन्म के बाद उसकी गर्भनाल अलग की जाती है, उसी तरह भगवान कृष्ण के जन्म के समय आधी रात को खीरे का डंठल काटकर उनके जन्म का प्रतीकात्मक उत्सव मनाया जाता है.

यह रस्म आमतौर पर भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय यानी रात 12 बजे की जाती है. इसके लिए ऐसा खीरा लिया जाता है, जिसमें ऊपर डंठल जुड़ा हुआ हो. खीरे को पूजा स्थल पर रखा जाता है और भगवान के जन्म के समय उसके डंठल को अलग किया जाता है. इसके बाद लड्डू गोपाल का अभिषेक और श्रृंगार किया जाता है तथा जन्मोत्सव मनाया जाता है.

देवकी-कृष्ण के वियोग से भी जुड़ी है मान्यता:

इस परंपरा को भगवान कृष्ण के जन्म के तुरंत बाद हुए माता देवकी से वियोग से भी जोड़ा जाता है. पौराणिक कथा के अनुसार, कंस के डर के कारण जन्म के बाद बाल कृष्ण को गोकुल ले जाया गया था. इस वजह से खीरे की यह रस्म केवल जन्म का प्रतीक नहीं मानी जाती, बल्कि मां और बच्चे के बीच उस भावुक क्षण और वियोग की याद से भी जोड़ी जाती है.

पूजा के बाद खीरे का क्या करें?

जन्माष्टमी की पूजा में माखन-मिश्री, फल और मिठाई के साथ खीरा भी अर्पित करने की परंपरा कई स्थानों पर देखने को मिलती है. पूजा पूरी होने के बाद इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है. धार्मिक मान्यता है कि प्रसाद ग्रहण करने से परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है.