भगवान शिव के कामदेव को भस्म करने से हुई थी होली की शुरुआत? जानें मां पार्वती से क्या था कनेक्शन
होली का त्योहार रंगों, प्रेम और अच्छाई की जीत का प्रतीक है. 2026 में यह 4 मार्च को मनाई जाएगी, जबकि होलिका दहन 3 मार्च को होगा.
नई दिल्ली: भोलेनाथ बहुत ही दयालु और दानी हैं लेकिन जब उन्हें क्रोध आता तो उनके आगे कोई नहीं टिक सकता. रंगों का त्योहार होली हर साल दिलों में उमंग भर देता है. यह सिर्फ रंग खेलने का अवसर नहीं, बल्कि पुरानी यादों को धो डालने और नए रिश्तों की शुरुआत का प्रतीक है. हिंदू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव है.
2026 में होली 4 मार्च को धूमधाम से मनाई जाएगी, जबकि एक दिन पहले 3 मार्च को होलिका दहन होगा. इस त्योहार की जड़ें गहरी पौराणिक कथाओं में हैं, खासकर भगवान शिव, कामदेव और राधा-कृष्ण की कहानियों में, जो आज भी लोगों को प्रेरित करती हैं.शिव की तपस्या और
कामदेव का प्रयास
माता पार्वती भगवान शिव से विवाह की इच्छा रखती थीं, लेकिन शिव जी गहन तपस्या में डूबे हुए थे. उनका मन किसी भी सांसारिक मोह से दूर था. तब प्रेम के देवता कामदेव ने पार्वती की सहायता के लिए कदम उठाया. उन्होंने शिव पर पुष्प बाण चलाया, जिससे उनकी तपस्या भंग हो गई. यह बाण काम की लहर पैदा करने वाला था, लेकिन शिव का ध्यान टूटते ही क्रोध की लपटें उठीं.
क्रोध की अग्नि और कामदेव का भस्म होना
क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपनी तीसरी आंख खोल दी. उस अग्नि की तेज रोशनी में कामदेव क्षण भर में भस्म हो गए. यह घटना पूरे देवलोक के लिए दुखदायी साबित हुई. कामदेव की अनुपस्थिति से प्रेम और सृजन की शक्ति प्रभावित होने लगी. देवताओं ने देखा कि यह कार्य अच्छे इरादे से किया गया था, फिर भी शिव का क्रोध शांत नहीं हो रहा था. इस घटना ने दिखाया कि तपस्या कितनी शक्तिशाली होती है.
प्रार्थना और शिव का वरदान
कामदेव की पत्नी ने भगवान शिव के सामने विनती की. उन्होंने बताया कि कामदेव ने यह सब पार्वती की मदद के लिए किया था. शिव जी का मन पिघला और उन्होंने कामदेव को अगले जन्म में प्रद्युम्न के रूप में जन्म लेने का आशीर्वाद दिया. इस खुशी में देवताओं ने रंग बिखेरकर उत्सव मनाया, जिसे होली की शुरुआत माना जाता है. यह कथा प्रेम की ताकत और क्षमा के महत्व को दर्शाती है.
राधा-कृष्ण की रंगों भरी लीला
होली का एक और रंगीन पहलू राधा और श्रीकृष्ण की कथा से जुड़ा है. बचपन में कृष्ण ने यशोदा मां से पूछा कि राधा इतनी गोरी कैसे हैं. मां ने मजाक में कहा कि रंग लगा दो. तब कृष्ण ने राधा और गोपियों पर रंग डालना शुरू किया. यह खेल प्रेम की मस्ती का प्रतीक बन गया. आज भी ब्रज में होली इसी उत्साह से मनाई जाती है, जहां रंग प्रेम की भाषा बोलते हैं.
होली का संदेश आज के दौर में
होली हमें सिखाती है कि पुरानी कटुता को भूलकर रिश्तों को रंगों से सजाना चाहिए. चाहे शिव-कामदेव की कथा हो या कृष्ण की लीला, हर कहानी प्रेम, क्षमा और उल्लास की बात करती है. 2026 की होली भी हमें एकजुट होने और खुशियां बांटने का मौका देगी. आइए इस बार रंगों के साथ-साथ दिलों को भी मिलाएं.
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