नई दिल्ली: आषाढ़ पूर्णिमा के दिन मनाई जाने वाली गुरु पूर्णिमा सनातन परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है. इस दिन गुरु, माता पिता, शिक्षकों और ज्ञान देने वाले सभी लोगों के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन श्रद्धा और भक्ति के साथ गुरु का पूजन करने से ज्ञान, सफलता और जीवन में सकारात्मकता का आशीर्वाद मिलता है.
धार्मिक मान्यताओं में कहा गया है कि गुरु पूर्णिमा के दिन कुछ कार्यों से बचना चाहिए. ऐसा माना जाता है कि इन बातों का ध्यान रखने से पूजा का महत्व बढ़ता है और गुरु कृपा प्राप्त होती है.
सबसे पहली बात इस दिन गुरु, शिक्षक, माता पिता, बुजुर्ग या किसी भी सम्माननीय व्यक्ति का अपमान नहीं करना चाहिए. कटु वचन बोलने, उपहास करने या अनादर करने से बचने की सलाह दी जाती है.
दूसरी मान्यता यह है कि गुरु के सामने हमेशा विनम्रता बनाए रखनी चाहिए. उनके सामने ऊंचे आसन पर बैठने या अहंकार का प्रदर्शन करने से बचना चाहिए. इसे सम्मान और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है.
तीसरी बात गुरु पूर्णिमा के दिन सात्विक भोजन करने की परंपरा है. कई लोग इस दिन व्रत रखते हैं और मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन तथा बासी भोजन से परहेज करते हैं.
चौथी मान्यता के अनुसार गुरु के पास खाली हाथ नहीं जाना चाहिए. श्रद्धा के अनुसार फल, फूल, मिठाई, वस्त्र या दक्षिणा अर्पित की जा सकती है. साथ ही काले रंग के वस्त्र, नुकीली वस्तुएं या अनुपयुक्त उपहार देने से बचने की सलाह दी जाती है.
पांचवीं मान्यता तुलसी से जुड़ी है. परंपरा के अनुसार पूर्णिमा के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते. यदि पूजा में तुलसी की आवश्यकता हो तो उन्हें एक दिन पहले ही तोड़कर रखने की सलाह दी जाती है.
छठी बात गुरु पूर्णिमा के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान, ध्यान और पूजा करना शुभ माना जाता है. इस दिन घर में विवाद, क्रोध और कलह से बचने की भी सलाह दी जाती है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ऐसा करने से घर का वातावरण सकारात्मक बना रहता है.
यदि किसी व्यक्ति के जीवन में कोई जीवित गुरु नहीं हैं या वे अपने गुरु से दूर हैं, तो परंपरा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण, भगवान शिव या महर्षि वेद व्यास को गुरु स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जा सकती है. गुरु पूर्णिमा का मुख्य संदेश ज्ञान, विनम्रता, सेवा और कृतज्ञता का भाव अपनाना है.