नई दिल्ली: 31 मई 2026 को पड़ने वाली अधिक मास पूर्णिमा को धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है. हिंदू पंचांग के अनुसार अधिक मास, जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है, भगवान विष्णु को समर्पित होता है. इस विशेष मास में आने वाली पूर्णिमा तिथि का महत्व सामान्य पूर्णिमा की तुलना में अधिक माना जाता है.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन किए गए पूजा-पाठ, दान और आध्यात्मिक कार्य विशेष फल प्रदान करते हैं. ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार इस वर्ष अधिक मास पूर्णिमा पर रवि योग सहित कई शुभ संयोग बन रहे हैं. रवि योग को सफलता और बाधाओं के निवारण के लिए शुभ माना जाता है. मान्यता है कि इस योग में किए गए धार्मिक कार्यों का सकारात्मक प्रभाव लंबे समय तक बना रहता है.
धार्मिक परंपराओं के अनुसार अधिक मास पूर्णिमा के दिन प्रातःकाल स्नान करके भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करना शुभ माना जाता है. कई श्रद्धालु इस अवसर पर व्रत, जप, दान और मंदिर दर्शन भी करते हैं. मान्यता है कि इससे सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है.
कुछ ज्योतिषीय परंपराओं में घर के मुख्य द्वार पर गंगाजल और हल्दी मिश्रित जल का छिड़काव करने की सलाह दी जाती है. इसके बाद मुख्य द्वार पर स्वास्तिक चिन्ह बनाने की परंपरा भी प्रचलित है. माना जाता है कि यह शुभता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है.
इसके अलावा पूर्णिमा के दिन पीपल के वृक्ष की पूजा का भी विशेष महत्व बताया गया है. श्रद्धालु पीपल के वृक्ष में जल अर्पित करते हैं और शाम के समय दीपक जलाते हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार इससे भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है.
माता लक्ष्मी की पूजा के दौरान मखाने और कौड़ियां अर्पित करने की परंपरा भी कई स्थानों पर प्रचलित है. पूजा के बाद इन वस्तुओं को धन रखने के स्थान पर रखने की मान्यता है. हालांकि यह पूरी तरह धार्मिक आस्था और परंपराओं पर आधारित है.
पूर्णिमा का संबंध चंद्रमा से होने के कारण इस दिन चंद्र देव को अर्घ्य देने का भी विशेष महत्व माना जाता है. रात में चंद्रमा को जल और दूध मिश्रित अर्घ्य अर्पित कर मंत्र जाप करने की परंपरा है. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इससे मानसिक शांति और सकारात्मकता प्राप्त होती है.