नई दिल्ली: भारत के लाखों केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए 8वां वेतन आयोग एक बड़ी उम्मीद बनकर उभरा है. हालांकि, सबसे बड़ा सवाल इसके लागू होने की तारीख को लेकर है. ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) का स्पष्ट कहना है कि वेतन और पेंशन में संशोधन 1 जनवरी 2026 से ही होना चाहिए. अगर सरकार कोई और तारीख चुनती है, तो कर्मचारियों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है.
ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो सरकार ने हमेशा पिछले वेतन आयोग के खत्म होने के अगले दिन से ही नया वेतनमान लागू किया है. छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट भले ही 2008 में आई थी, लेकिन इसका लाभ 1 जनवरी 2006 से दिया गया था. इसी तरह, सातवें वेतन आयोग का कार्यकाल 31 दिसंबर 2025 को समाप्त हो रहा है. कर्मचारी उम्मीद कर रहे हैं कि सरकार इस परंपरा को निभाते हुए एरियर का भुगतान समय से करेगी.
सातवां वेतन आयोग फरवरी 2014 में बना था और इसे लागू होने में लगभग ढाई साल लगे थे. छठा वेतन आयोग अक्टूबर 2006 में गठित हुआ था और इसकी सिफारिशें अगस्त 2008 में अमल में आईं. वहीं, पांचवें वेतन आयोग को अपनी प्रक्रिया पूरी करने में साढ़े तीन साल का लंबा वक्त लगा था. इन रुझानों को देखते हुए कर्मचारी चाहते हैं कि 8वें आयोग की प्रक्रिया 18 महीने के भीतर पूरी हो जाए ताकि उन्हें लंबा इंतजार न करना पड़े.
पेंशन सुधारों को लेकर भी माहौल गर्म है. AITUC ने मांग की है कि NPS और हाल ही में घोषित UPS को वापस लेकर पुरानी पेंशन योजना (OPS) को फिर से बहाल किया जाए. यूनियन का मानना है कि पेंशनर्स के हितों की अनदेखी नहीं की जा सकती. इसके अलावा, पेंशन बहाली के कंप्यूटेशन की अवधि को 15 साल से घटाकर 11 या 12 साल करने और हर पांच साल में पेंशन बढ़ाने का प्रस्ताव भी सरकार के सामने मजबूती से रखा गया है.
वेतन वृद्धि की गणना के लिए 'फिटमेंट फैक्टर' सबसे महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है. कर्मचारी यूनियनों ने अपनी मांगों का फीडबैक सरकार को देना शुरू कर दिया है. फेडरेशन ऑफ नेशनल पोस्टल ऑर्गेनाइजेशंस ने सरकार से सिफारिश की है कि फिटमेंट फैक्टर को 3.0 से बढ़ाकर 3.25 के बीच रखा जाए. यह बदलाव कर्मचारियों की बेसिक सैलरी में एक बड़ा उछाल ला सकता है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति और जीवन स्तर में काफी सुधार होने की प्रबल संभावना है.
आठवें वेतन आयोग ने कर्मचारियों, पेंशनर्स और विभिन्न यूनियनों से काम्पन्सेशन रिवीजन पर लिखित सुझाव मांगे हैं. इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, यूनियनों का तर्क है कि महंगाई और वर्तमान आर्थिक स्थिति को देखते हुए पे रिवीजन पहले ही देय हो चुका है. अब सारा दारोमदार आयोग की सिफारिशों और सरकार के अंतिम फैसले पर टिका है. कर्मचारी वर्ग इस बात पर नजर गड़ाए है कि क्या उनकी मांगें आगामी घोषणाओं में प्राथमिकता से शामिल होंगी.