अंधेरे में हर सेकंड में बन रहा एक फोन, चीन की इस फैक्ट्री में ये क्या हो रहा, देखें वीडियो

एक ऐसी विशाल फैक्ट्री की जहां न कोई लाइट जलती है, न कोई लंच ब्रेक होता है और न ही कोई इंसान नजर आता है.फैक्ट्री में असेंबली से लेकर टेस्टिंग और पैकेजिंग तक, सब कुछ रोबोटिक आर्म्स और AI संभालते हैं.

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Ashutosh Rai

नई दिल्ली डेस्क: कल्पना कीजिए एक ऐसी विशाल फैक्ट्री की जहां न कोई लाइट जलती है, न कोई लंच ब्रेक होता है और न ही कोई इंसान नजर आता है. चीन की राजधानी बीजिंग के चांगपिं जिले में दिग्गज टेक कंपनी Xiaomi ने ठीक ऐसा ही करिश्मा कर दिखाया है. कंपनी ने अपनी पहली पूरी तरह से ऑटोमेटेड स्मार्टफोन फैक्ट्री शुरू की है, जो 24 घंटे बिना किसी इंसान के चल सकती है.

ऐसी सोचना भी कुछ साल पहले पाप था. एआई और टेक की दुनिया इतनी तेज विकसित होगी, यह किसी को अंदाजा नहीं था. आने वाले समय में चीन ऐसे कई कारनामे करते दिखाई दे सकता है. वहीं भारत आज भी कास्ट, रिलीजन और यूजीसी जैसे मुद्यों पर ही अटका हुआ है. चीन जैसे देश अपने आप को भारत से 50 साल आगे मानते हैं और यहीं सच होता दिख रहा है.

डार्क फैक्ट्री का जादू

इस फैक्ट्री को डार्क फैक्ट्री इसलिए कहा जाता है क्योंकि रोबोट्स को काम करने के लिए रोशनी की जरूरत नहीं होती.यहां हर एक सेकंड में एक हाई-एंड स्मार्टफोन बनकर तैयार हो जाता है. 81,000 वर्ग मीटर में फैली यह फैक्ट्री साल भर में 1 करोड़ से ज्यादा फोन बनाने की ताकत रखती है. श्याओमी ने इस भविष्यवादी प्लांट को बनाने में करीब 330 मिलियन डॉलर लगभग 2,700 करोड़ रुपए खर्च किए हैं. श्याओमी की यह फैक्ट्री केवल एक इमारत नहीं, बल्कि मैन्युफैक्चरिंग के भविष्य का एक ट्रेलर है.

इंसान नहीं, AI है बॉस

इस फैक्ट्री में असेंबली से लेकर टेस्टिंग और पैकेजिंग तक, सब कुछ रोबोटिक आर्म्स और AI संभालते हैं. AI सिस्टम रियल-टाइम में हर फोन की जांच करता है. अगर कोई छोटी सी भी खराबी आती है, तो मशीनें खुद उसे पहचानकर ठीक कर लेती हैं. यहां धूल के स्तर को भी मशीनें ही कंट्रोल करती हैं, ताकि फोन के सेंसर्स और लेंस पर एक कण भी न जम सके.

चीन के बाहर कब?

यह सवाल अब पूरी दुनिया के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को डरा भी रहा है और उत्साहित भी कर रहा है. जानकारों का मानना है कि अगले 5 साल में भारत, वियतनाम और अमेरिका जैसे देश हाइब्रिड ऑटोमेशन (इंसान + रोबोट) की ओर बढ़ेंगे. अमेरिका और यूरोप में भी 2030 तक ऐसी लाइट्स-आउट फैक्ट्रियां दिखने लगेंगी, खासकर सेमीकंडक्टर और ऑटोमोबाइल सेक्टर में. चीन के पास इस वक्त दुनिया के 52% औद्योगिक रोबोट्स हैं. बाकी दुनिया को इस स्तर तक पहुंचने के लिए भारी निवेश और स्किल्ड इंजीनियरों की जरूरत होगी.