एक चुटकी में पहचान जाएंगे नकली सामान, बस स्मार्टफोन की होगी जरूरत! जानें कैसे

दुनियाभर में नकली प्रोडक्ट्स का बाजार हजारों करोड़ रुपये का है. यह कुल ग्लोबल ट्रेड का करीब 2 प्रतिशत हिस्सा है. नकली सामान कंपनियों और ग्राहकों दोनों को भारी नुकसान पहुंचाता है.

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Shilpa Srivastava

नई दिल्ली: दुनियाभर में नकली प्रोडक्ट्स का बाजार हजारों करोड़ रुपये का है. यह कुल ग्लोबल ट्रेड का करीब 2 प्रतिशत हिस्सा है. नकली सामान कंपनियों और ग्राहकों दोनों को भारी नुकसान पहुंचाता है. नकली बनाने वाले लगातार और स्मार्ट होते जा रहे हैं, जिससे असली और नकली में फर्क करना मुश्किल हो गया है. कंपनियां महंगे ऑथेंटिकेशन सिस्टम पर निर्भर रहती हैं, जिनमें खास स्कैनर या हार्डवेयर की जरूरत पड़ती है.

अब रिसर्चरों ने एक नया आसान तरीका निकाला है. उनका दावा है कि अब सिर्फ स्मार्टफोन की मदद से नकली सामान की पहचान की जा सकती है. आइए जानते हैं यह कैसे काम करेगा. यह एक न्यू प्रिटिंग सिस्टम है. चलिए जानते हैं इस तकनीक के बारे में. 

नया प्रिंटिंग सिस्टम क्या है?

रिसर्चरों ने एक खास प्रिंटिंग सिस्टम तैयार किया है. इससे रिस्पॉन्सिव एंटी-काउंटरफिट लेबल बनाए जाएंगे. ये लेबल मजबूत होंगे, बड़ी संख्या में आसानी से बनाए जा सकेंगे और स्मार्टफोन से स्कैन किए जा सकेंगे. पूरी प्रक्रिया आसान और सस्ती है. महंगे इक्विपमेंट की जरूरत नहीं पड़ेगी, इसलिए ज्यादा कंपनियां और लोग इसे अपना सकेंगे. ग्राहक और दुकानदार घर बैठे या दुकान पर फोन से ही सामान की जांच कर सकेंगे. नया सिस्टम सामान्य लेबल नहीं बनाएगा. इसमें तीन टेक्नोलॉजी का कॉम्बिनेशन होगा.


एक लेबल में तीन टेक्नोलॉजी:

  • पहली टेक्नोलॉजी है टेंपरेचर और लाइट रिस्पॉन्सिव माइक्रोकैप्सूल. इन्हें हाई-स्पीड प्रिंटिंग के लिए यूवी इंक के साथ मिलाया गया है. ये माइक्रोकैप्सूल लाइट और तापमान के संपर्क में आकर रिएक्ट करते हैं. इससे हर बार अलग ऑप्टिकल सिग्नेचर बनता है, जिसे दूसरे प्रिंटिंग तरीकों से कॉपी करना लगभग असंभव है.

  • दूसरी टेक्नोलॉजी ड्यूरेबिलिटी पर फोकस करती है. नैनोटेक्नोलॉजी बेस्ड लिंकर पॉलीमर कैप्सूल को मजबूती देता है. गर्मी और नमी में भी लेबल स्थिर रहता है. इंक में कोई ऑर्गेनिक सॉल्वेंट नहीं है, इसलिए स्क्रीन और इंकजेट प्रिंटिंग से आसानी से प्रिंट हो जाता है. टेस्टिंग में रंग नहीं फेड हुआ, यानी सप्लाई चेन की मुश्किलों को भी झेल सकता है.

  • तीसरी टेक्नोलॉजी वेरिफिकेशन से जुड़ी है. एक पोर्टेबल डिटेक्टर लेबल पर लाइट कैसे इंटरैक्ट करती है, यह देखता है. फिर मशीन लर्निंग मॉडल इस डेटा का विश्लेषण करके बताता है कि प्रोडक्ट असली है या नकली. 

ट्रायल में इस सिस्टम ने 97 प्रतिशत से ज्यादा सटीकता दिखाई. यह असली और बहुत मिलते-जुलते नकली लेबल में भी फर्क करने में सफल रहा.

स्मार्टफोन से बदलेगा खेल:

अभी कंपनियां होलोग्राम, क्यूआर कोड और आरएफआईडी जैसे फीचर्स इस्तेमाल करती हैं. इससे लागत बढ़ती है और कई बार खास हार्डवेयर की जरूरत पड़ती है. नया सिस्टम सिर्फ स्मार्टफोन से काम चला लेगा. कंपनियों को अतिरिक्त हार्डवेयर पर खर्च नहीं करना पड़ेगा. ग्राहकों के लिए भी फायदेमंद है. वे बिना किसी झंझट के फोन से सामान की जांच कर सकेंगे. रिसर्चरों का कहना है कि यह टेक्नोलॉजी पैकेजिंग इंडस्ट्री में इस्तेमाल के लिए तैयार है. कंपनियां इसे अपनी प्रोडक्शन लाइन में आसानी से शामिल कर सकती हैं.

क्या फायदा होगा?  

  • नकली सामान रोकने में मदद मिलेगी.  

  • कंपनियों की लागत कम होगी.  

  • ग्राहक आसानी से असली प्रोडक्ट की पहचान कर सकेंगे.  

  • सप्लाई चेन में पारदर्शिता बढ़ेगी.

यह नया तरीका नकली प्रोडक्ट्स की समस्या से निपटने में बड़ा बदलाव ला सकता है. अगर कंपनियां इसे अपनाती हैं तो ग्राहकों को धोखा कम मिलेगा और असली ब्रांड्स को सुरक्षा मिलेगी.