नई दिल्ली: ट्रैफिक सिग्नल तो आपने काफी ज्यादा देखे होंगे. इसमें लाल, पीली और हरी लाइट्स जलती हैं. इनके अलग-अलग मतलब होते हैं. जैसे लाल लाइट मतलब रुको, पीली लाइट मतलब सावधानी और तैयार होना, ग्रीन मतलब आगे बढ़ सकते हैं. वैसे तो यह आपको पता ही होगा. इसके अनुसार ही हम रोड पर आगे बढ़ते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन सिग्नल को भी हैक किया जा सकता है?
आजकल ज्यादातर चीजें डिजिटल रूप से कनेक्टेड रहती हैं, इसलिए साइबर सुरक्षा का मुद्दा भी बढ़ गया है. तो चलिए जानते हैं कि ट्रैफिक सिग्नल कैसे काम करता है और क्या उन्हें हैक करना संभव है.
पहले के समय में ट्रैफिक सिग्नल केवल टाइमर पर काम करते हैं. फिर टाइमर पूरा होने के बाद यह अपने आप बदल जाती थी. लेकिन अब बड़े शहरों में एडवांस सिग्नल लगाए जा रहे हैं. ये कैमरा, सेंसर, ट्रैफिक कंट्रोल सेंटर और नेटवर्क से कनेक्टेड रहते हैं. सड़क पर कितनी गाड़ियां हैं, इसके हिसाब से सिग्नल का समय बदला जा सकता है. यही कनेक्टिविटी इन सिग्नल्स को स्मार्ट बनाती है, लेकिन साथ ही सुरक्षा का ध्यान रखना भी जरूरी हो जाता है.
हां, ट्रैफिक सिग्नल को हैक किया जा सकता है. अगर नेटवर्क बहुत ज्यादा सिक्योर नहीं है या सॉफ्टवेयर ज्यादा पुराना हो गया या कोई अनधिकृत व्यक्ति सिस्टम को एक्सेस करने में सफल हो जाता है, तो सिग्नल को हैक किया जा सकता है. हालांकि, इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि कोई आम आदमी मोबाइल या लैपटॉप से आसानी से सड़क के सिग्नल को हैक कर सकता है. एडवांस ट्रैफिक सिस्टम में कई सुरक्षा लेयर्स होती हैं, जो इन्हें हैक करना इतना भी आसान नहीं बनाती हैं.
अगर किसी ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम पर कोई साइबर क्रिमिनल अटैक करता है तो सिग्नल कुछ समय के लिए गड़बड़ा सकता है. इससे चौराहों पर ट्रैफिक फ्लो बिगड़ सकता है या फिर सिग्नल का तालमेल खत्म हो सकता है. ऐसी स्थिति में ट्रैफिक जाम बढ़ सकता है. सिर्फ इतना ही नहीं, दुर्घटना का खतरा भी बढ़ सकता है. अगर कैमरा और सेंसर सिस्टम प्रभावित हो जाते हैं तो प्रशासन को रियल-टाइम में सही जानकारी नहीं मिल पाएगी, जिससे ट्रैफिक मैनेजमेंट मुश्किल में आ जाएगा.