जब मोबाइल नहीं था तब पहाड़ों पर ऐसे बजता था खतरे का सायरन, जानें सदियों पुराना तरीका

जब फोन, सैटेलाइट कम्युनिकेशन और आधुनिक चेतावनी सिस्टम नहीं थे, तब पहाड़ी इलाकों में आपदाओं की सूचना नीचे बसे गांवों तक पहुंचाना आसान नहीं था. चलिए जानते हैं सूचना कैसे पहुंचाई जाती थी.

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Km Jaya

नई दिल्ली: आज मोबाइल फोन और इंटरनेट के दौर में मौसम और प्राकृतिक आपदाओं की जानकारी कुछ ही सेकंड में लोगों तक पहुंच जाती है लेकिन जब फोन, सैटेलाइट कम्युनिकेशन और आधुनिक चेतावनी सिस्टम नहीं थे, तब पहाड़ी इलाकों में लैंडस्लाइड, हिमस्खलन और बाढ जैसी आपदाओं की सूचना नीचे बसे गांवों तक पहुंचाना आसान नहीं था. ऐसे समय में लोग आग, धुएं, आवाज और पारंपरिक संकेतों का सहारा लेते थे.

पहाड़ी इलाकों में ऊंची जगह पर आग जलाना आपदा की सूचना देने का एक पुराना तरीका था. रात में पहाड़ की ऊंचाई पर जलती आग दूर से दिखाई देती थी. दिन में आग से निकलने वाला धुआं आसपास के गांवों और दूसरी चोटियों से देखा जा सकता था. इस तरह बिना किसी तार या उपकरण के खतरे का संकेत दूर तक पहुंचाया जाता था.

'खडपटिया' से मिलता था खतरे का संकेत

हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदा की चेतावनी देने के लिए 'खडपटिया' जैसे पारंपरिक संकेतों का इस्तेमाल किया जाता था. यह सूखी लकडियों का ढेर होता था. किसी खतरे की जानकारी मिलने पर इसमें आग लगा दी जाती थी. ऊंचे स्थान पर जलने वाली आग को देखकर आसपास के लोग समझ जाते थे कि पहाड़ के ऊपर कोई गंभीर स्थिति बनी है.


शंख और तुरही से भी देते थे चेतावनी

आग और धुएं के अलावा तेज आवाज भी चेतावनी का माध्यम थी. कई पहाड़ी इलाकों में शंख, तुरही और दूसरे पारंपरिक वाद्य बजाकर लोगों को सतर्क किया जाता था. आवाज घाटियों में दूर तक सुनाई दे सकती थी. खतरे के अनुसार अलग तरह की आवाज या संकेत तय किए जाते थे.

पटाखे और विस्फोट भी बने चेतावनी का साधन

कुछ जगहों पर बाद के समय में पटाखों, बंदूक की आवाज या नियंत्रित विस्फोटों का इस्तेमाल भी खतरे का संकेत देने के लिए किया गया. तेज आवाज दूर तक पहुंचती थी और लोगों को किसी आपात स्थिति के लिए तैयार होने का संदेश देती थी. हालांकि ऐसे तरीकों का इस्तेमाल स्थानीय परिस्थितियों और उपलब्ध साधनों पर निर्भर करता था.

आल्प्स में बजती थीं चर्च की घंटियां

यूरोप के आल्प्स जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में भी ध्वनि आधारित चेतावनी व्यवस्था का इस्तेमाल होता था. पहाडों पर बने चर्चों की घंटियां बजाकर बाढ़ और हिमस्खलन जैसे खतरों की सूचना दी जाती थी. कई स्थानों पर अलग तरह की घंटी या लय का मतलब अलग चेतावनी से जुडा होता था.

अल्पाइन हॉर्न की आवाज पहुंचती थी दूर

आल्प्स क्षेत्र में अल्पाइन हॉर्न जैसे लंबे वाद्य भी इस्तेमाल किए जाते थे. इनकी गहरी और तेज आवाज पहाड़ी घाटियों में काफी दूर तक पहुंच सकती थी. इसके जरिए आसपास के लोगों और दूसरी बस्तियों तक सांकेतिक संदेश पहुंचाने की कोशिश की जाती थी.

बिना तकनीक के था पूरा स्थानीय सिस्टम

इन पारंपरिक तरीकों में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका स्थानीय लोगों की होती थी. ऊंचे स्थानों पर तैनात लोग खतरे को देखते ही तय संकेत देते थे और नीचे रहने वाले लोग उनका मतलब समझकर दूसरों को सतर्क करते थे. इस तरह आग, धुआं, घंटी और आवाज मिलकर एक तरह की पुरानी आपदा चेतावनी व्यवस्था का काम करते थे.