RBI से बड़ी राहत चाहते हैं बैंक, ANBC से बाहर रखने की उठी मांग
बैंकों ने RBI से इंफ्रास्ट्रक्चर लोन को ANBC की गणना से बाहर रखने की मांग की है. इससे उनका PSL लक्ष्य घट सकता है, PSLC खरीदने का खर्च कम होगा और बड़े प्रोजेक्ट्स को कर्ज देना आसान हो सकता है.
देश के बड़े वाणिज्यिक बैंक इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को दिए जाने वाले बड़े कर्ज को लेकर RBI से राहत चाहते हैं. बैंकों का कहना है कि हाईवे, पावर और पोर्ट जैसे प्रोजेक्ट्स के भारी लोन से ANBC बढ़ता है, जिससे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के लिए तय 40 प्रतिशत कर्ज लक्ष्य पूरा करना मुश्किल हो जाता है.
इंफ्रा लोन को ANBC से बाहर रखने की मांग
बैंकों की दलील है कि बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को दिए जाने वाले लंबे समय के कर्ज को ANBC यानी Adjusted Net Bank Credit की गणना में शामिल करने से उनके लिए नियामकीय बोझ बढ़ जाता है. किसी एक्सप्रेसवे, बिजली परियोजना या बंदरगाह के लिए हजारों करोड़ रुपये का कर्ज देने पर बैंक का ANBC आधार बढ़ जाता है.
इसके साथ ही प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को दिए जाने वाले कर्ज की अनिवार्य मात्रा भी बढ़ जाती है. बैंक चाहते हैं कि ऐसे इंफ्रा लोन को गणना से अलग किया जाए, ताकि उनकी बैलेंस शीट पर इसका असर कम हो और पूंजी का इस्तेमाल बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सके.
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40 फीसदी PSL लक्ष्य बन रहा चुनौती
मौजूदा व्यवस्था के तहत घरेलू कमर्शियल बैंकों को अपने ANBC का कम से कम 40 प्रतिशत हिस्सा प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को देना होता है. इसमें कृषि, सूक्ष्म और लघु उद्योग, कमजोर वर्ग तथा किफायती आवास जैसे क्षेत्र शामिल हैं.
बड़े बैंकों का कहना है कि यदि कोई बैंक 10,000 या 20,000 करोड़ रुपये का इंफ्रा लोन देता है तो उसका ANBC आधार अचानक बढ़ जाता है. इसके अनुपात में कृषि और छोटे कारोबारों को अतिरिक्त कर्ज देना पड़ता है. कई बड़े कॉर्पोरेट बैंकों के पास ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त शाखा नेटवर्क नहीं होने के कारण इस लक्ष्य को सीधे पूरा करना मुश्किल होता है.
PSLC खरीदने का बढ़ रहा खर्च
जब बैंक प्राथमिकता क्षेत्र के कर्ज का निर्धारित लक्ष्य पूरा नहीं कर पाते, तो उन्हें अनुपालन बनाए रखने के लिए Priority Sector Lending Certificates यानी PSLC खरीदने पड़ते हैं. इन प्रमाणपत्रों की लागत बढ़ने से बैंकों पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव पड़ता है और इसका असर मुनाफे तथा नेट इंटरेस्ट मार्जिन पर भी पड़ सकता है.
बैंक अब इसी वजह से इंफ्रा लोन को ANBC से अलग करने की मांग कर रहे हैं. उनका तर्क है कि लंबी अवधि के इंफ्रास्ट्रक्चर बॉन्ड को पहले ही CRR, SLR और PSL जैसी कुछ बाध्यताओं से राहत मिलती है. इसी आधार पर बैंक सीधे दिए गए दीर्घकालिक इंफ्रा कर्ज के लिए भी समान व्यवस्था चाहते हैं.
अक्टूबर में RBI के रुख पर नजर
अगर RBI इस प्रस्ताव को मंजूरी देता है तो बैंकों के लिए प्राथमिकता क्षेत्र के कर्ज की गणना का आधार छोटा हो सकता है. इससे उन्हें कृषि और MSME जैसे क्षेत्रों में अनिवार्य अतिरिक्त कर्ज देने की जरूरत कम पड़ सकती है और PSLC खरीदने का खर्च भी घट सकता है.
दूसरी ओर, बैंक मानते हैं कि इससे इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए कर्ज उपलब्ध कराने की क्षमता बढ़ेगी और बड़े प्रोजेक्ट्स को फंड मिलने की रफ्तार तेज हो सकती है. हालांकि अंतिम फैसला RBI के हाथ में है. बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र की नजर अब अक्टूबर 2026 में होने वाली मौद्रिक नीति समीक्षा तथा नियामकीय चर्चाओं पर है, जहां इस मांग पर स्थिति स्पष्ट हो सकती है.