चीन के साथ 112 अरब डॉलर का व्यापार घाटा, बढ़ती खाई को पाटने के लिए क्या करेगा भारत?

भारत और चीन के बीच व्यापार घाटा 112.16 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है. इसे कम करने के लिए भारत को चीन में निर्यात कई गुना बढ़ाना होगा. दवाएं, कृषि और इंजीनियरिंग सामान अहम क्षेत्र हैं.

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Kuldeep Sharma

नई दिल्ली: भारत और चीन के बीच व्यापार काफी बड़ा है, लेकिन दोनों देशों के बीच कारोबार का संतुलन भारत के पक्ष में नहीं है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने चीन को 19.47 अरब डॉलर का सामान निर्यात किया, जबकि चीन से 131.63 अरब डॉलर का माल आयात किया. यानी दोनों देशों के बीच भारत का व्यापार घाटा 112.16 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया.

अब भारत और चीन इस असंतुलन को कम करने पर बातचीत कर रहे हैं. लेकिन आंकड़े बताते हैं कि इस अंतर को कम करना आसान नहीं होगा. अगर चीन से भारत का आयात अभी जितना है, उतना ही बना रहता है, तो केवल 10 फीसदी व्यापार घाटा कम करने के लिए भी भारत को चीन में 11.22 अरब डॉलर का अतिरिक्त सामान बेचना होगा.

10 फीसदी घाटा कम करने के लिए निर्यात में बड़ी छलांग जरूरी

अगर भारत अपने व्यापार घाटे को सिर्फ 10 फीसदी कम करना चाहता है तो चीन को होने वाला उसका निर्यात 19.47 अरब डॉलर से बढ़कर करीब 30.69 अरब डॉलर करना होगा. यानी मौजूदा स्तर से लगभग 58 फीसदी ज्यादा निर्यात करना पड़ेगा.


अगर लक्ष्य घाटे को 25 फीसदी तक कम करने का हो तो भारत को करीब 28.04 अरब डॉलर का अतिरिक्त निर्यात करना होगा. ऐसी स्थिति में चीन को भारत का कुल निर्यात लगभग 47.51 अरब डॉलर तक पहुंचना चाहिए. यह मौजूदा स्तर से करीब 144 फीसदी ज्यादा होगा.

वहीं, अगर भारत व्यापार घाटे को आधा करना चाहता है तो उसे चीन में लगभग 56.08 अरब डॉलर का अतिरिक्त सामान बेचना पड़ेगा. इसके लिए कुल निर्यात करीब 75.55 अरब डॉलर तक पहुंचाना होगा, जो अभी के मुकाबले लगभग चार गुना है.

निर्यात बढ़ रहा है, फिर भी घाटा क्यों बढ़ रहा?

भारत के लिए एक सकारात्मक बात यह है कि चीन को उसका निर्यात तेजी से बढ़ा है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का चीन को निर्यात 36.6 फीसदी बढ़कर 19.47 अरब डॉलर हो गया. इससे एक साल पहले यह आंकड़ा 14.25 अरब डॉलर था.

लेकिन समस्या यह है कि इसी दौरान चीन से भारत का आयात भी बहुत ज्यादा बढ़ा और 131.63 अरब डॉलर तक पहुंच गया. यानी भारत के निर्यात में हुई अच्छी बढ़ोतरी भी आयात के मुकाबले काफी छोटी रही.

2026 के शुरुआती छह महीनों में भी यही तस्वीर दिखाई दी. चीन के कस्टम आंकड़ों के अनुसार, जनवरी से जून 2026 के बीच भारत का चीन को निर्यात सालाना आधार पर 37.2 फीसदी बढ़कर 12.31 अरब डॉलर रहा. दूसरी ओर, चीन का भारत को निर्यात 79.41 अरब डॉलर पहुंच गया. सिर्फ छह महीनों में भारत का व्यापार घाटा करीब 67.1 अरब डॉलर हो गया.

इससे साफ है कि केवल निर्यात की रफ्तार बढ़ाना काफी नहीं है. भारत का मौजूदा निर्यात आधार इतना छोटा है कि तेज वृद्धि के बावजूद कुल अंतर बहुत तेजी से कम नहीं हो रहा.

चीन भारत से क्या ज्यादा खरीद सकता है?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत चीन को ऐसा क्या ज्यादा बेच सकता है, जिससे व्यापार घाटे में बड़ी कमी आए. फार्मास्युटिकल यानी दवा उद्योग को इस मामले में एक बड़ा अवसर माना जा रहा है.

नीति आयोग के अनुमान के मुताबिक, 2025 में चीन की दवाओं के आयात की जरूरत करीब 40.4 अरब डॉलर थी. भारत दुनिया में जेनेरिक दवाओं के बड़े सप्लायरों में शामिल है, लेकिन चीन के दवा आयात में भारत की हिस्सेदारी सिर्फ 0.2 फीसदी रही.

उल्टा, वित्त वर्ष 2025-26 में चीन को भारत का फार्मास्युटिकल निर्यात 11.54 फीसदी घटकर 287.42 मिलियन डॉलर रह गया. निर्यातकों के मुताबिक, नियामकीय मंजूरियों, कीमतों को लेकर प्रतिस्पर्धा, खरीद से जुड़ी प्राथमिकताओं और बाजार तक पहुंच जैसी चुनौतियां इसके पीछे हैं.

खेती से लेकर इंजीनियरिंग सामान तक बढ़ सकती है पहुंच

कृषि क्षेत्र में भी भारत लंबे समय से चीन के बाजार तक ज्यादा पहुंच चाहता रहा है. भारत चीन को चावल, ऑयलमील, फल, सब्जियां और दूसरे कृषि उत्पादों का निर्यात बढ़ाना चाहता है. जून 2026 में APEDA ने चीन को चावल निर्यात से जुड़ी नई प्रक्रिया भी जारी की थी.

कुछ दूसरे क्षेत्रों में भी निर्यात बढ़ने के संकेत मिले हैं. जून में चीन को भारत के इंजीनियरिंग सामान का निर्यात 74 फीसदी बढ़कर 361.47 मिलियन डॉलर हो गया. सरकारी अधिकारियों ने प्रिंटेड सर्किट बोर्ड, इलेक्ट्रिकल उपकरण, टेलीफोन सिस्टम, झींगा, एल्युमिनियम इनगॉट, जहाज और कुछ कृषि उत्पादों के निर्यात में बढ़ोतरी का भी जिक्र किया है.

लेकिन इन आंकड़ों से एक दूसरी बात भी सामने आती है. 100 अरब डॉलर से ज्यादा के व्यापार घाटे को कम करने के लिए केवल कुछ उत्पादों की बिक्री बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा. कई क्षेत्रों को मिलकर चीन में अरबों डॉलर की अतिरिक्त बिक्री हासिल करनी होगी.

पहले भी हो चुकी है व्यापार संतुलित करने की कोशिश

भारत और चीन के बीच व्यापार को संतुलित करने की कोशिश नई नहीं है. मार्च 2018 में दोनों देशों ने व्यापार असंतुलन कम करने के लिए एक रोडमैप तैयार करने पर सहमति जताई थी.

उस समय चीन ने कहा था कि वह गैर-बासमती चावल, रेपसीड मील, सोयामील, अनार, भिंडी, केले और दूसरे फलों-सब्जियों के साथ-साथ कुछ अन्य भारतीय उत्पादों के लिए बाजार पहुंच बढ़ाने पर काम करेगा. भारतीय दवाओं के लिए बाजार खोलने पर भी दोनों देशों के बीच चर्चा हुई थी.

लेकिन इसके आठ साल बाद तस्वीर बहुत ज्यादा नहीं बदली. 2018 में भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा करीब 63.05 अरब डॉलर था. वित्त वर्ष 2025-26 में यह बढ़कर 112.16 अरब डॉलर हो गया. यानी इस अवधि में घाटा करीब 78 फीसदी बढ़ गया.

असली चुनौती सिर्फ वादा नहीं, जमीन पर बदलाव है

भारत और चीन के बीच व्यापार को लेकर हालिया बातचीत में दोनों देशों ने इस असंतुलन को दूर करने की जरूरत मानी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की 12 सितंबर की मुलाकात के बाद जारी बयान में भी 'स्ट्रक्चरल ट्रेड इंबैलेंस' यानी व्यापार के ढांचे में मौजूद असंतुलन को दूर करने की बात कही गई.

अब असली सवाल यह है कि चीन का बाजार भारतीय उत्पादों के लिए कितना खुलता है और भारत का निर्यात वास्तव में कितनी तेजी से बढ़ता है. अगर भारतीय दवाओं, कृषि उत्पादों, इंजीनियरिंग सामान और दूसरे क्षेत्रों को चीन में ज्यादा बाजार मिलता है, तभी 112 अरब डॉलर की बड़ी खाई को धीरे-धीरे कम किया जा सकता है.