हरिद्वार का नाम 'हर का द्वार' क्यों पड़ा? भगवान शिव की ससुराल से जुड़ा ऐसा रहस्य, जिसे बहुत कम लोग जानते हैं
हरिद्वार को 'हर का द्वार' क्यों कहा जाता है? जानिए भगवान शिव, केदारनाथ यात्रा, कनखल और दक्षेश्वर महादेव मंदिर से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं की पूरी कहानी.
उत्तराखंड की पवित्र नगरी हरिद्वार सदियों से आस्था, श्रद्धा और आध्यात्मिक परंपराओं का केंद्र रही है. यहां हर साल लाखों श्रद्धालु गंगा स्नान और मंदिरों के दर्शन के लिए पहुंचते हैं. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि हरिद्वार को 'हर का द्वार' कहने के पीछे भी एक गहरी पौराणिक मान्यता जुड़ी हुई है. धार्मिक ग्रंथों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार भगवान शिव का इस नगरी से विशेष संबंध रहा है. यही कारण है कि हरिद्वार केवल भगवान विष्णु का प्रवेश द्वार नहीं, बल्कि भोलेनाथ की नगरी के रूप में भी विशेष पहचान रखता है.
मायापुरी से हरिद्वार तक का सफर
धार्मिक ग्रंथों में हरिद्वार का प्राचीन नाम मायापुरी बताया गया है. यह हिंदू धर्म के सात पवित्र नगरों में शामिल है. यहां हर 12 वर्ष में कुंभ मेले का आयोजन होता है, जिसमें देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालु पहुंचते हैं. स्कंद पुराण, शिव पुराण और पद्म पुराण सहित कई ग्रंथों में इस पवित्र नगर का उल्लेख मिलता है.
केदारनाथ यात्रा से जुड़ा है नाम का संबंध
पंडितों की मानें तो प्राचीन समय में केदारनाथ धाम जाने वाले श्रद्धालु हरिद्वार में गंगा स्नान करने के बाद नंगे पैर यात्रा शुरू करते थे. गंगा तट के आसपास भगवान शिव के अनेक सिद्ध पीठ होने और केदारनाथ मार्ग का प्रवेश द्वार होने के कारण इस स्थान को 'हर का द्वार' कहा जाने लगा.
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कनखल में है भगवान शिव की ससुराल
हरिद्वार के कनखल क्षेत्र का धार्मिक महत्व बेहद खास माना जाता है. यहीं स्थित प्रसिद्ध दक्षेश्वर महादेव मंदिर को भगवान शिव की ससुराल माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी स्थान का संबंध राजा दक्ष और माता सती की कथा से जुड़ा है, जिससे यह तीर्थ श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र बन गया.
चातुर्मास में बढ़ जाता है धार्मिक महत्व
आषाढ़ मास से शुरू होने वाले चातुर्मास के दौरान भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है. मान्यता है कि इस अवधि में गंगाजल, दूध और रुद्राभिषेक से भगवान शिव की आराधना करने पर मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस समय हरिद्वार पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं.
आज भी कायम है हरिद्वार की आध्यात्मिक पहचान
समय के साथ हरिद्वार आधुनिक सुविधाओं से जुड़ गया है, लेकिन इसकी धार्मिक और पौराणिक पहचान आज भी वैसी ही बनी हुई है. गंगा घाट, शिव मंदिर और प्राचीन तीर्थस्थल हर साल लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं. यही वजह है कि हरिद्वार आज भी आस्था और सनातन परंपरा का प्रमुख केंद्र माना जाता है.