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माउंट एवरेस्ट का नाम कैसे पड़ा? जवाब छिपा है मसूरी के इस 200 साल पुराने घर में

4 जुलाई को सर जॉर्ज एवरेस्ट के जन्मदिन पर जानिए मसूरी स्थित 200 साल पुराने जॉर्ज एवरेस्ट हाउस की कहानी, जहां से भारत के ऐतिहासिक सर्वेक्षण का संचालन हुआ.

ChatGpt (प्रतिकात्मक)
Reepu Kumari

दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट का नाम लगभग हर कोई जानता है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि जिस व्यक्ति के नाम पर इस पर्वत का नाम रखा गया, उसकी सबसे महत्वपूर्ण कर्मस्थली उत्तराखंड का मसूरी था. 4 जुलाई को सर जॉर्ज एवरेस्ट के जन्मदिन के मौके पर उनकी ऐतिहासिक विरासत फिर चर्चा में है. करीब दो सौ साल पहले मसूरी की ऊंची पहाड़ियों पर बैठकर सर जॉर्ज एवरेस्ट ने भारत के भूगोल को नई दिशा दी. आधुनिक तकनीक के बिना किए गए उनके सर्वेक्षण ने देश का वैज्ञानिक आधार पर सटीक मानचित्र तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. आज भी उनका ऐतिहासिक आवास उस गौरवशाली इतिहास की गवाही देता है.

मसूरी से संचालित हुआ ऐतिहासिक सर्वेक्षण

मसूरी के इतिहासकार गोपाल भारद्वाज के अनुसार वर्ष 1832 में सर जॉर्ज एवरेस्ट भारत के सर्वेयर जनरल बने और उन्होंने अपने कार्यों के लिए मसूरी को केंद्र बनाया. उस दौर में न जीपीएस था और न ही उपग्रह, फिर भी यहीं से ग्रेट ट्रिगोनोमेट्रिकल सर्वे जैसे ऐतिहासिक अभियान का संचालन किया गया. इसी सर्वेक्षण के जरिए भारत की सीमाओं, पर्वतों, नदियों और भू-भाग का वैज्ञानिक दस्तावेज तैयार हुआ. यह कार्य अपने समय की सबसे बड़ी सर्वेक्षण उपलब्धियों में गिना जाता है और भारतीय भूगोल के विकास में इसकी अहम भूमिका रही.

ऐसी जगह चुनी, जहां से दिखता था पूरा प्राकृतिक विस्तार

सर जॉर्ज एवरेस्ट ने अपना आवास मसूरी की सबसे ऊंची पहाड़ियों में इसलिए बनाया क्योंकि वहां से हिमालय की चोटियां, दून घाटी और यमुना घाटी साफ दिखाई देती थीं. यह स्थान सर्वेक्षण उपकरणों के संचालन और दूर तक नजर रखने के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता था. यहीं बैठकर कई दिनों तक वैज्ञानिक गणनाएं होती थीं और फिर सर्वेक्षण दल देश के अलग-अलग हिस्सों में माप लेने के लिए रवाना होते थे. यही वजह है कि यह भवन केवल एक घर नहीं, बल्कि भारतीय सर्वेक्षण इतिहास का अहम केंद्र माना जाता है.


माउंट एवरेस्ट का नाम खुद नहीं रखा था अपने नाम पर

दिलचस्प तथ्य यह है कि दुनिया की सबसे ऊंची चोटी का नाम सर जॉर्ज एवरेस्ट ने कभी अपने नाम पर रखने की इच्छा नहीं जताई थी. वर्ष 1865 में उनके उत्तराधिकारी एंड्रयू वॉ ने उनके योगदान का सम्मान करते हुए पीक-15 का नाम माउंट एवरेस्ट रखने का प्रस्ताव दिया. इसके बाद उनका नाम पूरी दुनिया में अमर हो गया. हालांकि, उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय मसूरी की उन्हीं पहाड़ियों से जुड़ा रहा, जहां उन्होंने वर्षों तक भारत के सर्वेक्षण कार्य का नेतृत्व किया.

आज इतिहास और पर्यटन का बड़ा आकर्षण

समय के साथ अंग्रेजी शासन समाप्त हो गया, लेकिन जॉर्ज एवरेस्ट हाउस आज भी मजबूती से खड़ा है. जहां कभी सर्वेक्षण उपकरण रखे जाते थे, वहां अब हर दिन बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं. यह स्थान इतिहास, प्राकृतिक सुंदरता और रोमांच का अनूठा संगम बन चुका है. हिमालय की बर्फीली चोटियों, दून घाटी और यमुना घाटी का विहंगम दृश्य इसे और खास बनाता है. सूर्योदय और सूर्यास्त के समय यहां का नजारा बेहद आकर्षक दिखाई देता है, जिससे यह युवाओं के बीच लोकप्रिय फोटो और रील डेस्टिनेशन भी बन चुका है.

वैज्ञानिक विरासत को सहेजने की जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि जॉर्ज एवरेस्ट हाउस केवल एक व्यू प्वाइंट नहीं, बल्कि भारत की वैज्ञानिक और प्रशासनिक विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक है. यह वह स्थान है, जहां से देश के व्यवस्थित मानचित्र तैयार करने की ऐतिहासिक प्रक्रिया को दिशा मिली. जानकारों का सुझाव है कि यदि इस धरोहर को आधुनिक संग्रहालय, डिजिटल गैलरी और इंटरैक्टिव हेरिटेज सेंटर के रूप में विकसित किया जाए तो यह इतिहास प्रेमियों, शोधार्थियों और पर्यटकों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर का आकर्षण बन सकता है.