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'यह पैसा किसी जरूरतमंद को दें', 'मोहम्मद दीपक' ने ठुकराया 2 लाख का पुरस्कार; झारखंड के मंत्री इरफान अंसारी ने किया था ऐलान

उत्तराखंड के कोटद्वार में मुस्लिम बुजुर्ग की सुरक्षा के लिए 'मोहम्मद दीपक' बनने वाले दीपक कुमार ने सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश की. उन्होंने इनाम की राशि ठुकराकर मानवता को राजनीति से ऊपर रखने का साहसी निर्णय लिया है.

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Kanhaiya Kumar Jha

देहरादून: कोटद्वार के दीपक कुमार आज सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का केंद्र बने हुए हैं. गणतंत्र दिवस के मौके पर एक छोटी सी घटना ने उन्हें रातों-रात एक नायक बना दिया. जब कुछ लोगों ने एक मुस्लिम दुकानदार के बोर्ड पर आपत्ति जताई, तब दीपक ने निडर होकर बुजुर्ग का बचाव किया. उनकी इस हिम्मत और निस्वार्थ सेवा ने न केवल स्थानीय लोगों का दिल जीता, बल्कि देशभर में भाईचारे और सांप्रदायिक एकता का एक नया संदेश भी प्रसारित किया है.

कोटद्वार में 26 जनवरी को जब कुछ संगठनों ने वकील अहमद की दुकान 'बाबा स्कूल गारमेंट्स' के नाम पर हंगामा किया, तब दीपक कुमार ढाल बनकर खड़े हो गए. जब भीड़ ने उनसे उनका धर्म पूछा, तो उन्होंने अपना नाम 'मोहम्मद दीपक' बताकर सबको चौंका दिया. यह नाम केवल एक पहचान नहीं, बल्कि नफरत के खिलाफ एकजुटता का प्रतीक बन गया. दीपक ने साबित किया कि मानवता का धर्म किसी भी संकीर्ण विचारधारा या भेदभाव से बहुत बड़ा होता है. 

पुरस्कार से बड़ी सेवा की भावना 

झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने दीपक की बहादुरी से प्रभावित होकर उन्हें 2 लाख रुपये का इनाम देने की घोषणा की. हालांकि, दीपक ने बड़े ही विनम्र भाव से इस पुरस्कार को स्वीकार करने से मना कर दिया. उन्होंने मंत्री जी से अनुरोध किया कि यह राशि किसी दिव्यांग या जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता के लिए इस्तेमाल की जाए. उनका यह निर्णय स्पष्ट करता है कि वे प्रसिद्धि या धन के लिए नहीं, बल्कि अपनी अंतरात्मा की आवाज पर कार्य करते हैं. [

दीपक कुमार को उत्तराखंड के कई दिग्गज नेताओं जैसे हरक सिंह रावत और सुरेंद्र सिंह नेगी का समर्थन प्राप्त हुआ है. इसके बावजूद, उन्होंने स्पष्ट किया है कि उनका किसी भी राजनीतिक दल से कोई लेना-देना नहीं है. वे खुद को एक साधारण व्यक्ति मानते हैं जो केवल सच्चाई के साथ खड़ा होना पसंद करता है. दीपक का मानना है कि धर्म या राजनीति के आधार पर लोगों को बांटना समाज के भविष्य और अखंडता के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है.

शब्दों के अर्थ और धार्मिक एकता 

दुकानदार वकील अहमद पिछले 30 सालों से अपनी दुकान इसी नाम से चला रहे हैं. उन्होंने बताया कि आज तक कभी किसी ने 'बाबा' शब्द पर आपत्ति नहीं जताई थी. उनके अनुसार, 'बाबा' शब्द किसी एक विशेष धर्म की जागीर नहीं है, बल्कि यह सभी समुदायों में बुजुर्गों के आदर के लिए प्रयुक्त होता है. दीपक के हस्तक्षेप ने न केवल उनकी दुकान को बचाया, बल्कि वर्षों से चले आ रहे आपसी विश्वास और प्रेम को भी टूटने से बचा लिया.