शिव के त्रिशूल से कटा था गणेश जी का सिर, इस जगह आज भी है मौजूद; रहस्य जानकर आप भी हो जाएंगे हैरान
उत्तराखंड के पिथौरागढ स्थित पाताल भुवनेश्वर गुफा में एक शिला को आदि गणेश के रूप में पूजा जाता है. धार्मिक मान्यता है कि यह भगवान शिव द्वारा काटे गए गणेश जी के मूल मस्तक का प्रतीक है.
पिथौरागढ़: उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित पाताल भुवनेश्वर गुफा अपनी रहस्यमयी प्राकृतिक संरचनाओं और धार्मिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है. मान्यता है कि इसी गुफा में भगवान शिव द्वारा काटे गए भगवान गणेश के मूल मानव मस्तक के रूप में एक शिला मौजूद है. इसे आदि गणेश के नाम से पूजा जाता है. हालांकि, भगवान गणेश के कटे हुए सिर से जुडी यह बात धार्मिक मान्यता है, इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है.
पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वती ने अपने उबटन से गणेश जी की रचना की थी. उन्होंने गणेश को द्वार पर पहरा देने और किसी को भी अंदर नहीं आने देने का आदेश दिया. इसी दौरान भगवान शिव वहां पहुंचे. गणेश जी उन्हें पहचान नहीं सके और माता की आज्ञा का पालन करते हुए शिव को अंदर जाने से रोक दिया.
कैसे हुआ सिर धड़ से अलग?
कहा जाता है कि कई बार समझाने के बाद भी गणेश जी अपने स्थान से नहीं हटे. इससे भगवान शिव क्रोधित हो गए और उन्होंने त्रिशूल से गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया. माता पार्वती को जब इस घटना का पता चला तो उन्होंने अपने पुत्र को जीवित करने की मांग की. इसके बाद भगवान शिव ने गणेश को पुनर्जीवित करने के लिए हाथी का सिर उनके धड पर स्थापित किया. तभी से उन्हें गजानन के नाम से भी जाना जाता है.
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पाताल भुवनेश्वर से जुडी है खास मान्यता
धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव द्वारा काटा गया गणेश जी का मानव मस्तक पाताल भुवनेश्वर गुफा में मौजूद है. गंगोलीहाट से करीब 14 किलोमीटर दूर स्थित इस गुफा में एक शिला रूपी आकृति को आदि गणेश कहा जाता है. मान्यता है कि कलयुग में इस गुफा की खोज आदि शंकराचार्य ने की थी.
गुफा में आदि गणेश की शिला के ऊपर 108 पंखुडियों वाले ब्रह्म कमल जैसी प्राकृतिक संरचना दिखाई देती है. धार्मिक मान्यता है कि इस संरचना से दिव्य बूंदें गणेश जी की शिला पर गिरती रहती हैं. इसे भगवान शिव से जोडकर देखा जाता है.
चार युगों से जुडा है रहस्य
पाताल भुवनेश्वर गुफा में चार पत्थरों को चार युगों का प्रतीक माना जाता है. इनमें से एक पत्थर को कलयुग का प्रतीक बताया जाता है. मान्यता है कि यह पत्थर धीरे धीरे ऊपर बढ रहा है. जिस दिन यह गुफा की छत को छू लेगा, उस दिन कलयुग समाप्त हो जाएगा. यह पूरी तरह धार्मिक मान्यता है और इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है.