नेपाल की आपदा के बाद उत्तराखंड अलर्ट, वसुंधरा ताल में लगेगा पहला Early Warning System

नेपाल में आई आपदा से सबक लेते हुए उत्तराखंड सरकार ने ग्लेशियल झीलों से होने वाली GLOF यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड की निगरानी मजबूत करने की पहल शुरू की है. चमोली के करीब 15 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित वसुंधरा ताल में प्रदेश का पहला अर्ली वॉर्निंग सिस्टम लगाया जाएगा.

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Babli Rautela

नेपाल में आई आपदा के बाद उत्तराखंड ने हिमनद झीलों से जुड़े संभावित खतरों को लेकर निगरानी और पूर्व चेतावनी व्यवस्था मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाया है. चमोली जिले में समुद्र तल से करीब 15 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित वसुंधरा ताल में प्रदेश का पहला अर्ली वॉर्निंग सिस्टम स्थापित किया जाएगा.

करीब 38 मीटर गहरी इस ग्लेशियल झील पर लगाए जाने वाले सिस्टम का उद्देश्य झील के जलस्तर, बर्फ, मौसम और आसपास होने वाली हलचल में बदलाव की लगातार निगरानी करना है. किसी असामान्य स्थिति के संकेत मिलने पर समय रहते अलर्ट तैयार करने में यह सिस्टम मदद करेगा.

20 सदस्यीय टीम वसुंधरा ताल के लिए रवाना

इस परियोजना के लिए CBRI रुड़की और वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों की 20 सदस्यीय टीम को रवाना किया गया है. मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने मंगलवार को सचिवालय से टीम को हरी झंडी दिखाकर वसुंधरा ताल के लिए रवाना किया. उन्होंने वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि GLOF के खतरे को कम करने और हिमनद झीलों से जुड़े जोखिमों को समझने में यह पहल महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.


क्या होता है GLOF?

GLOF यानी Glacial Lake Outburst Flood हिमनद झील से अचानक बड़ी मात्रा में पानी बाहर निकलने की घटना है. पहाड़ों में ग्लेशियरों के पिघलने से बनी झीलों में पानी जमा होता रहता है. अगर किसी वजह से झील का पानी अचानक बाहर निकलता है तो नीचे के इलाकों में तेज बहाव के साथ बाढ़ जैसी स्थिति बन सकती है.

ऐसी घटनाओं में पानी के साथ बर्फ, पत्थर और मलबा भी नीचे की ओर आ सकता है. इसलिए हिमनद झीलों की लगातार निगरानी और संभावित खतरे की पहले जानकारी मिलना महत्वपूर्ण माना जाता है.

कैसे काम करेगा अर्ली वॉर्निंग सिस्टम

वसुंधरा ताल में लगाया जाने वाला सिस्टम कई तरह के सेंसर और संचार तकनीक से लैस होगा. इसका सबसे अहम हिस्सा जलस्तर सेंसर होगा, जो झील के पानी में होने वाले असामान्य बदलाव को रिकॉर्ड करेगा. इसके साथ ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन लगाया जाएगा. यह तापमान, नमी, बारिश, हवा की गति और दिशा, वायुदाब और प्रकाश की तीव्रता जैसे मौसम संबंधी आंकड़े रिकॉर्ड करेगा.