उत्तराखंड के गठन के समय उत्तर प्रदेश से राज्य को बिजली योजनाओं के रूप में करीब 550 करोड़ रुपये की संपत्ति मिली थी. यह रकम ऊर्जा निगम को संपत्ति के रूप में बिजली दरों में समायोजित होकर मिलनी थी, लेकिन आज तक इसका भुगतान नहीं हो सका.
इस संपत्ति के रखरखाव पर हर साल होने वाला खर्च लगातार जुड़ता गया. समय के साथ 550 करोड़ रुपये की मूल राशि और उससे जुड़े खर्च का बोझ बढ़कर करीब 5900 करोड़ रुपये तक पहुंच गया. अब वित्त विभाग इस रकम को ऊर्जा निगम से मिलने वाली राशि के साथ समायोजित करने को तैयार नहीं है. इसके बाद ऊर्जा निगम ने इस राशि की वसूली बिजली उपभोक्ताओं से करने का प्रस्ताव रखा है.
ऊर्जा निगम के प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है तो उपभोक्ताओं पर सीधा आर्थिक असर पड़ सकता है. आकलन के मुताबिक 5900 करोड़ रुपये की रिकवरी के लिए कुछ समय तक बिजली की कीमत करीब तीन रुपये प्रति यूनिट तक बढ़ाई जा सकती है. इसका मतलब है कि पहले से बिजली बिल का भुगतान कर रहे घरेलू, व्यावसायिक और औद्योगिक उपभोक्ताओं को अतिरिक्त रकम चुकानी पड़ सकती है. हालांकि अभी यह तय नहीं हुआ है कि बिजली की दर वास्तव में कितनी बढ़ेगी. अंतिम निर्णय विद्युत नियामक आयोग की ओर से लिया जाएगा.
विद्युत नियामक आयोग में इस प्रस्ताव को लेकर बुधवार को जनसुनवाई हुई. खास बात यह रही कि आम उपभोक्ताओं की ओर से विरोध दर्ज कराने के लिए कोई प्रतिनिधि नहीं पहुंचा. हालांकि इंडस्ट्री एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड के प्रतिनिधि राजीव अग्रवाल अपने एक सहयोगी के साथ सुनवाई में शामिल हुए.
जनसुनवाई में आम लोगों की गैरमौजूदगी पर आयोग अध्यक्ष एमएल प्रसाद ने भी हैरानी जताई. उन्होंने कहा कि लोगों को आपत्ति दर्ज कराने के लिए पर्याप्त समय दिया गया था. मामले की जानकारी प्रकाशित कराने के साथ आयोग की वेबसाइट पर भी सूचना उपलब्ध कराई गई थी. इसके बावजूद आम उपभोक्ताओं की ओर से कोई आपत्ति दर्ज कराने नहीं पहुंचा. ऐसे में अब आयोग के सामने ऊर्जा निगम के प्रस्ताव, उपलब्ध आपत्तियों और सुझावों के आधार पर आगे फैसला लेने की प्रक्रिया है.