बिजली गुल, वेंटिलेटर बंद और जनरेटर फेल... देहरादून अस्पताल में 10 मिनट तक ऐसे बची मासूमों की जान
देहरादून के दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल के पीकू में बिजली जाने से तीन वेंटिलेटर बंद हो गए. जनरेटर भी समय पर नहीं चला. चिकित्सकों ने एंबु बैग से बच्चों की सांसें संभालीं और बड़ा हादसा टला.
देहरादून के राजकीय दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल में गुरुवार रात बिजली आपूर्ति ठप होने से पीकू में भर्ती गंभीर बच्चों की जान पर संकट खड़ा हो गया. रात करीब 11:20 बजे ओटी इमरजेंसी भवन की बिजली चली गई और कुछ ही देर में पीकू का यूपीएस भी बंद हो गया. बैकअप के लिए लगा जनरेटर भी तत्काल शुरू नहीं हो सका. इससे वेंटिलेटर पर निर्भर तीन बच्चों को चिकित्सकों ने हाथ से सांस देने की व्यवस्था की.
बिजली जाते ही बंद हुए जीवनरक्षक उपकरण
बिजली गुल होने के बाद पीकू में अंधेरा छा गया और वेंटिलेटर पर भर्ती तीन बच्चों के उपकरण बंद हो गए. इनमें दो, पांच और 15 वर्षीय बच्चियां तथा सात माह का बच्चा शामिल था. चिकित्सकों और कर्मचारियों ने तुरंत एंबु बैग से मैनुअल वेंटिलेशन शुरू किया. करीब 10 मिनट तक बच्चों को इसी तरीके से सांस दी गई. सात अन्य ऑक्सीजन सपोर्ट वाले बच्चों की निगरानी भी बढ़ा दी गई.
जनरेटर ने भी नहीं दिया साथ
बिजली जाने के बाद अस्पताल का जनरेटर भी तुरंत चालू नहीं हुआ. उसका पैनल हैंग होने की बात सामने आई. इस दौरान पीकू में मौजूद बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. अशोक कुमार, पीजी चिकित्सकों और स्टाफ ने मोर्चा संभाला. घटना की जानकारी अस्पताल की प्राचार्य डॉ. गीता जैन और चिकित्सा अधीक्षक को दी गई. करीब 10 मिनट बाद जनरेटर चालू हुआ, जिसके बाद वेंटिलेटर और दूसरे जरूरी उपकरण फिर काम करने लगे.
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एक साल से खराब थीं बैटरियां
इस घटना ने अस्पताल की तैयारी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. पीकू के वेंटिलेटरों की बैटरियां करीब एक वर्ष से खराब होने की जानकारी सामने आई है. यूपीएस की जांच और व्यवस्था सुधारने के लिए संबंधित विभाग को पिछले एक साल में चार पत्र भी भेजे गए थे. इसके बावजूद समस्या दूर नहीं हुई. ऐसे में बिजली व्यवस्था ठप होने के बाद बैकअप की कमजोरी सामने आ गई.
प्राचार्य ने मांगी मामले की रिपोर्ट
घटना के बाद प्राचार्य डॉ. गीता जैन ने चिकित्सा अधीक्षक को व्यवस्था सुधारने के निर्देश दिए और पूरे मामले की रिपोर्ट मांगी. उन्होंने सभी विभागाध्यक्षों से व्यवस्थाओं में मौजूद कमियों की जानकारी देने को कहा है. चिकित्सा अधीक्षक डॉ. आरएस बिष्ट के मुताबिक, अधिक लोड के कारण समस्या आई थी. अब लोड का आकलन कराया जा रहा है और यूपीएस की क्षमता बढ़ाने के साथ वेंटिलेटरों की बैटरियां बदलने की प्रक्रिया की जा रही है.
संकट में एंबु बैग बना जीवनरक्षक
एंबु बैग ऐसे मरीजों को कृत्रिम सांस देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जो खुद ठीक से सांस नहीं ले पाते. इसे हाथ से दबाकर फेफड़ों तक हवा या ऑक्सीजन पहुंचाई जाती है. गुरुवार रात यही उपकरण तीन बच्चों के लिए तत्काल सहारा बना. डॉक्टरों की तत्परता से स्थिति संभल गई, लेकिन घटना ने यह सवाल जरूर खड़ा किया है कि संवेदनशील चिकित्सा इकाई की बैकअप व्यवस्था समय रहते क्यों नहीं सुधारी गई.