'ये दिल मांगे मोर' कहकर दुश्मन के छक्के छुड़ाने वाले कैप्टन विक्रम बत्रा को देश का सलाम, बलिदान दिवस पर CM धामी ने किया नमन
कारगिल युद्ध के परमवीर चक्र विजेता कैप्टन विक्रम बत्रा के बलिदान दिवस पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की.
कारगिल युद्ध के अमर नायक और परमवीर चक्र से सम्मानित कैप्टन विक्रम बत्रा के बलिदान दिवस पर पूरा देश उन्हें श्रद्धापूर्वक याद कर रहा है. 7 जुलाई 1999 को मातृभूमि की रक्षा करते हुए उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया था. आज भी उनका साहस, नेतृत्व और देश के प्रति समर्पण करोड़ों भारतीयों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है. उनके बलिदान दिवस पर विभिन्न स्तरों पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जा रही है.
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी कैप्टन विक्रम बत्रा को भावभीनी श्रद्धांजलि दी. उन्होंने कहा कि कारगिल युद्ध के इस वीर सपूत ने राष्ट्र रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया और उनका अमर बलिदान सदैव देशवासियों को मातृभूमि की सेवा के लिए प्रेरित करता रहेगा. कैप्टन विक्रम बत्रा का जीवन और शौर्य भारतीय सेना के इतिहास में साहस और राष्ट्रभक्ति का स्वर्णिम अध्याय माना जाता है.
मुख्यमंत्री धामी ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कैप्टन विक्रम बत्रा के बलिदान दिवस पर उन्हें कोटिशः नमन किया. उन्होंने कहा कि कारगिल युद्ध के वीर नायक और परमवीर चक्र से सम्मानित कैप्टन विक्रम बत्रा ने राष्ट्र रक्षा के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया. मुख्यमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि उनका अमर बलिदान, अदम्य साहस और राष्ट्रभक्ति का आदर्श हमेशा देशवासियों को मातृभूमि की सेवा के लिए प्रेरित करता रहेगा. उनके त्याग और वीरता को देश सदैव सम्मान के साथ याद रखेगा.
Also Read
- उत्तराखंड में बच्चों से जुड़ी आपत्तिजनक ऑनलाइन सामग्री पर बड़ी कार्रवाई, STF ने जारी की चेतावनी
- हरिद्वार के मनसा देवी मंदिर में पुजारियों के लिए नया ड्रेस कोड लागू, बिना जेब वाले कुर्ते में ही होगी पूजा
- रेल यात्रियों को बड़ी सौगात! टनकपुर से नांदेड तक दौड़ी नई एक्सप्रेस, शाहजहांपुर तक बढ़ी ट्रेन सेवा
हिमाचल की धरती से निकला एक वीर सपूत
कैप्टन विक्रम बत्रा का जन्म 9 सितंबर 1974 को हिमाचल प्रदेश के पालमपुर के पास घुग्गर गांव में हुआ था. उनके पिता जी.एल. बत्रा स्कूल के प्रिंसिपल और मां जय कमल बत्रा शिक्षिका थीं. बचपन से ही अनुशासन और देशभक्ति के संस्कार मिलने के बाद उन्होंने 1996 में भारतीय सैन्य अकादमी, देहरादून से प्रशिक्षण लिया और 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में कमीशन प्राप्त किया.
'ये दिल मांगे मोर' ने बना दिया राष्ट्रीय पहचान
सेना में शुरुआती तैनाती सोपोर में हुई. वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान उन्हें टोलोलिंग सेक्टर में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली. उन्होंने पॉइंट 5140 पर दुश्मन को पीछे हटाकर जीत हासिल की. इस सफलता के बाद रेडियो पर उनका संदेश "ये दिल मांगे मोर" पूरे देश में साहस और विजय का प्रतीक बन गया. इसके बाद उन्हें कैप्टन पद पर पदोन्नत किया गया.
पॉइंट 4875 पर दिखाई अदम्य बहादुरी
पॉइंट 5140 की सफलता के बाद कैप्टन विक्रम बत्रा को पॉइंट 4875 पर अभियान की जिम्मेदारी मिली. यह कारगिल युद्ध के सबसे कठिन अभियानों में शामिल था. दुश्मन की गोलाबारी के बीच उन्होंने अपने साथियों का नेतृत्व किया, पांच पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया और घायल होने के बावजूद आगे बढ़ते रहे. 7 जुलाई 1999 को लड़ते हुए उन्होंने मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया.
परमवीर चक्र से सम्मानित हुए 'शेरशाह'
कैप्टन विक्रम बत्रा के अदम्य साहस और नेतृत्व को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया. उनकी वीरता के सम्मान में पॉइंट 4875 को आज 'बत्रा टॉप' के नाम से जाना जाता है. भारतीय सेना में उन्हें 'शेरशाह' के नाम से भी याद किया जाता है.
नई पीढ़ी के लिए आज भी हैं प्रेरणा
कैप्टन विक्रम बत्रा की वीरगाथा आज भी देश के युवाओं को राष्ट्र सेवा के लिए प्रेरित करती है. वर्ष 2021 में रिलीज हुई फिल्म 'शेरशाह' के माध्यम से उनके जीवन और शौर्य को नई पीढ़ी तक पहुंचाया गया. उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि देश की रक्षा के लिए समर्पण और साहस सबसे बड़ा कर्तव्य है.