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हरिद्वार में अर्धकुंभ मेले की तैयारियां जोरों पर, जानें कब होंगे मुख्य स्नान

अर्धकुंभ मेले की तैयारियां जोरों पर चल रही हैं. चलिए जानते हैं अर्धकुंभ कब से शुरू होगा समेत अन्य जानकारी.

Shilpa Shrivastava
हरिद्वार में अर्धकुंभ मेले की तैयारियां जोरों पर, जानें कब होंगे मुख्य स्नान
Courtesy: AI Generated

हरिद्वार: अर्धकुंभ मेले की तैयारियां जोरों पर चल रही हैं. कुछ ही समय पहले अर्धकुंभ को लेकर एक फैसला लिया गया था कि हरिद्वार को नई सांस्कृतिक पहचान देने के लिए शहर में लगने वाले सभी साइनबोर्ड, सूचना पट्टिकाएं और डिस्प्ले बोर्डों पर संस्कृत भाषा का इस्तेमाल अनिवार्य होगा. हर बोर्ड पर हिंदी के साथ-साथ संस्कृत में भी जानकारी लिखी जाएगी. जहां जरूरी होगा, वहां अंग्रेजी का भी उपयोग किया जाएगा. यह नियम सिर्फ सरकारी विभागों पर नहीं, बल्कि निजी संस्थानों, स्कूलों, कॉलेजों, बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों, घाटों और सड़क के साइनबोर्ड पर भी लागू होगा. चलिए जानते हैं अर्धकुंभ कब से शुरू होगा.

अर्धकुंभ कब से शुरू होगा: 

नउत्तराखंड की पवित्र नगरी हरिद्वार में अर्धकुंभ मेला 2027 का भव्य आयोजन 14 जनवरी से 20 अप्रैल 2027 तक लगभग साढ़े तीन महीने चलेगा. इस दौरान कुल 10 प्रमुख स्नान होंगे, जिनमें 4 शाही (अमृत) स्नान शामिल हैं. मुख्य स्नान तिथियां इस प्रकार हैं: 14 जनवरी (मकर संक्रांति), 6 फरवरी (मौनी अमावस्या - शाही स्नान), 11 फरवरी (बसंत पंचमी), 20 फरवरी (माघ पूर्णिमा), 6 मार्च (महाशिवरात्रि), 8 मार्च (फाल्गुन अमावस्या - शाही स्नान), 7 अप्रैल (नव संवत्सर), 14 अप्रैल (मेष संक्रांति - शाही स्नान), 15 अप्रैल (राम नवमी) और 20 अप्रैल (चैत्र पूर्णिमा - शाही स्नान). 

राज्य सरकार इस भव्य आयोजन की तैयारी में पूरी तरह जुट गई है. सुरक्षा, यातायात प्रबंधन, घाटों की सफाई और सुविधाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है. अर्धकुंभ में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु, साधु-संत और अखाड़ों का संगम होगा, जो हरिद्वार को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देगा.

क्यों लिया गया था संस्कृत भाषा को दिखाने का फैसला?

उत्तराखंड में संस्कृत दूसरी राजभाषा है. हरिद्वार लंबे समय से संस्कृत शिक्षा का बड़ा केंद्र रहा है. यहां कई संस्कृत विद्यालय, महाविद्यालय और संस्कृत अकादमियां चलती हैं. प्रशासन का कहना है कि अर्धकुंभ मेला आने वाले लाखों श्रद्धालुओं और पर्यटकों को भारतीय संस्कृति का सच्चा अनुभव देने के लिए यह कदम उठाया गया है. इससे हरिद्वार की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान और मजबूत होगी.