यूपी में भी बिहार का फॉर्मूला दोहराएंगे विनोद तावड़े! BJP की 'हैट्रिक जीत' के लिए तैयार हुआ बड़ा सियासी प्लान

भाजपा ने 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव की जिम्मेदारी विनोद तावड़े को दी है. बिहार में गठबंधन प्रबंधन और संगठन को मजबूत करने की उनकी रणनीति सफल रही थी. अब यूपी में बड़ी चुनौती है.

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Kanhaiya Kumar Jha

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए बेहद अहम है. पार्टी ने राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े को चुनाव प्रभारी बनाकर ऐसी जिम्मेदारी दी है, जिसमें संगठन, सामाजिक समीकरण और सहयोगी दलों के साथ तालमेल सबसे बड़ी कसौटी होंगे. बिहार में सफल चुनावी प्रबंधन के बाद अब सवाल है कि क्या तावड़े यूपी में भी वही रणनीति दोहरा पाएंगे. प्रदेश संगठन में बदलाव और नेताओं से उनकी लगातार बैठकों ने संकेत दे दिया है कि पार्टी बड़े प्रयोग की तैयारी में है.

विनोद तावड़े सितंबर 2022 में बिहार के प्रभारी बने थे. उस समय भाजपा विपक्ष में थी और नीतीश कुमार एनडीए छोड़कर महागठबंधन सरकार बना चुके थे. तावड़े ने संगठन और सहयोगी दलों के बीच तालमेल पर जोर दिया. कार्यकर्ताओं से सीधे संवाद और स्थानीय स्तर की जानकारी जुटाने की उनकी शैली ने पार्टी को चुनावी रणनीति बनाने में मदद की. बाद में बिहार में एनडीए की सरकार बनी और भाजपा का प्रदर्शन भी मजबूत हुआ.

यूपी में संगठन को नए सिरे से तैयार किया

उत्तर प्रदेश में तावड़े पिछले करीब एक साल से संगठन से जुड़े कामों में सक्रिय रहे हैं. उन्होंने मंत्रियों, विधायकों और पार्टी पदाधिकारियों से मुलाकात की. प्रदेश इकाई में बड़े बदलाव के दौरान भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही. करीब दो तिहाई प्रदेश पदाधिकारियों और सभी छह क्षेत्रीय अध्यक्षों को बदला गया. इससे संकेत मिला कि पार्टी 2027 से पहले संगठन को नए तरीके से चुनावी मोड में तैयार करना चाहती है.


दो सौ टिकट बदलने की चर्चा

भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में मौजूदा जनप्रतिनिधियों के खिलाफ नाराजगी भी है. राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि पार्टी बड़ी संख्या में मौजूदा विधायकों के टिकट बदल सकती है. तावड़े को इसी रणनीति को जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी मिल सकती है. उनका फोकस उम्मीदवार चयन के साथ बूथ स्तर की तैयारी, मतदाता सूची के सत्यापन और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने पर रहने की संभावना है.

जातीय समीकरण और सहयोगियों की चुनौती

यूपी में तावड़े के सामने सामाजिक संतुलन साधना सबसे कठिन काम होगा. भाजपा को सवर्ण मतदाताओं, खासकर ब्राह्मणों के साथ गैर-यादव OBC और अति-दलित वर्गों को भी जोड़े रखना होगा. साथ ही अपना दल (एस), निषाद पार्टी, रालोद और सुभासपा जैसे सहयोगियों के साथ सीट बंटवारा अहम रहेगा. बिहार की तरह यहां भी छोटे-छोटे सामाजिक समूहों और स्थानीय नेताओं के बीच बेहतर समन्वय चुनावी परिणाम पर असर डाल सकता है.

संगठनकर्ता से चुनावी रणनीतिकार तक का सफर

तावड़े का राजनीतिक सफर संगठन से शुरू हुआ और धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचा. 1995 में वह महाराष्ट्र भाजपा के महासचिव बने और 1999 में मुंबई भाजपा अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली. 2014 में बोरीवली से विधायक बने और फडणवीस सरकार में मंत्री रहे. 2019 में टिकट कटने के बाद उन्होंने संगठन में काम जारी रखा. बाद में राष्ट्रीय महासचिव बने और हरियाणा, बिहार समेत कई राज्यों की जिम्मेदारी संभाली. अब यूपी उनकी सबसे बड़ी परीक्षा है.