उत्तर प्रदेश में 10 सीटों पर उपचुनाव; कैंडिडेट्स के नाम से कैंपेन की रणनीति तक... आखिर CM योगी क्यों चाहते हैं खुली छूट?

उत्तर प्रदेश में 10 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने हैं. कहा जा रहा है कि उपचुनाव को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ किसी तरह की कोई कमी नहीं छोड़ना चाहते हैं, इसलिए वे उपचुनाव में कैंडिडेट्स की घोषणा से लेकर चुनावी रणनीति तैयार करने और पार्टी के नेताओं की नियुक्ति करने तक, सारे अधिकार अपने पास रखना चाहते हैं. कुछ महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा को यूपी में करारी हार का सामना करना पड़ा था.

social media
India Daily Live

उत्तर प्रदेश में होने वाले 10 विधानसभा सीटों के उपचुनाव में अंतिम फैसला लेने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपनी कमर कस ली है. हाल ही में हुए लोकसभा चुनावों में राज्य में भाजपा के खराब प्रदर्शन को लेकर सबसे ज्यादा आलोचनाओं का सामना कर रहे मुख्यमंत्री ने बुधवार को राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (RSS) के संयुक्त महासचिव अरुण कुमार के साथ बैठक की. बैठक के बाद आदित्यनाथ को पार्टी की बैठक और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के साथ व्यक्तिगत वार्ता के लिए गुरुवार शाम दिल्ली पहुंचना था.

सूत्रों ने बताया कि अरुण कुमार चाहते थे कि बैठक भाजपा कार्यालय में हो, लेकिन ये आदित्यनाथ के आधिकारिक आवास पर हुई. आदित्यनाथ के करीबी लोगों का कहना है कि वह उपचुनावों में पूरी तरह से खुली छूट चाहते हैं. इसमें उम्मीदवारों के नाम को अंतिम रूप देने से लेकर अभियान की रणनीति तैयार करने और पार्टी नेताओं को नियुक्त करने तक का काम शामिल है.

मुख्यमंत्री द्वारा खुली छूट की मांग उनके खेमे के उन दावों के बाद आई है, जिनमें कहा गया है कि जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी सौंपने, अभियान की रणनीति और उम्मीदवारों के चयन के संबंध में उनके सुझावों और सुझावों को लोकसभा चुनावों के दौरान नजरअंदाज कर दिया गया था. इन चुनावों में भाजपा की सीटों की संख्या घटकर 33 रह गई, जो 2019 की लगभग आधी थी.

योगी आदित्यनाथ ने भाजपा राज्य समिति की बैठक में उठाए थे मुद्दे

आदित्यनाथ ने 15 जुलाई को लखनऊ में भाजपा राज्य कार्यसमिति की बैठक में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए ये मुद्दे उठाए थे, जहां उन्होंने पार्टी को ‘अति आत्मविश्वास’ की कीमत चुकाने की बात भी कही थी. दूसरी तरफ से तर्क यह है कि आदित्यनाथ के शासन में इस मूल सिद्धांत की अनदेखी की गई है कि संगठन सरकार से बड़ा है. 15 जुलाई की बैठक में उपमुख्यमंत्री और आदित्यनाथ के प्रतिद्वंद्वी केशव मौर्य ने दावा किया कि पार्टी चलाने के मामले में वे किसी भी आम कार्यकर्ता की तरह असहाय हैं.

दो दिन बाद 17 जुलाई को आदित्यनाथ ने अपने आवास पर अपने करीबी माने जाने वाले मंत्रियों के साथ बैठक की थी, जिसमें मौर्य, दूसरे डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक और प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी मौजूद नहीं थे. बैठक में सीएम ने मौजूद मंत्रियों को खाली हो रही 10 सीटों पर होने वाले उपचुनावों की देखरेख की जिम्मेदारी दी. इसके बाद केंद्रीय नेतृत्व ने हस्तक्षेप किया और दिल्ली में आदित्यनाथ, दोनों उपमुख्यमंत्रियों और चौधरी के साथ अलग-अलग बैठकें कीं.

5 अगस्त की बैठक में साथ आए दोनों डिप्टी सीएम

आदित्यनाथ ने 5 अगस्त को अपने आवास पर एक और बैठक की, जिसमें दोनों उपमुख्यमंत्री, चौधरी और राज्य भाजपा कार्यकारिणी के अन्य वरिष्ठ पदाधिकारी मौजूद थे, साथ ही वे मंत्री भी मौजूद थे जिन्हें मुख्यमंत्री के करीबी माना जाता है. हालांकि आदित्यनाथ ने अपने डिप्टी और चौधरी को बातचीत में शामिल किया, लेकिन उन्होंने फिर से उन्हें बाहर रखने के अपने इरादे साफ कर दिए. पहले जिन मंत्रियों को सीटों की जिम्मेदारी दी गई थी, उन्हें अपना काम जारी रखने को कहा गया, जबकि प्रदेश अध्यक्ष और डिप्टी सीएम को क्षेत्रों में कैंप करके निगरानी करने को कहा गया.

मुख्यमंत्री के दृढ़ संकल्प का एक और संकेत वे सीटें हैं जिनकी जिम्मेदारी उन्होंने खुद ली है. इनमें अयोध्या में मिल्कीपुर और अंबेडकर नगर में कटेहरी को 10 सीटों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है. मिल्कीपुर सीट समाजवादी पार्टी के विधायक अवधेश प्रसाद द्वारा फैजाबाद (जिसके अंतर्गत अयोध्या आता है) से जीत हासिल करने के बाद खाली हुई थी, जबकि कटेहरी में सपा विधायक लालजी वर्मा ने मौजूदा सांसद और भाजपा उम्मीदवार रितेश पांडेय को हराया था, जो चुनाव से ठीक पहले बसपा से भाजपा में शामिल हुए थे.

मिल्कीपुर और कटेहरी के आसपास चार कार्यक्रम कर चुके हैं योगी

इस महीने की शुरुआत से अब तक आदित्यनाथ इन दोनों विधानसभा सीटों या आस-पास के इलाकों में चार बार कई कार्यक्रम आयोजित कर चुके हैं. अन्य विधानसभा सीटों के मामले में भी मुख्यमंत्री ने उम्मीदवारों के नाम तय करने के लिए अपने विश्वस्त लोगों से जमीनी रिपोर्ट तैयार करवाई है. 

मतदाताओं के बीच बेरोजगारी एक बड़ी चिंता है और लोकसभा चुनावों में इसे एक महत्वपूर्ण कारक के रूप में पहचाना जाता है, इसलिए आदित्यनाथ रोजगार मेलों पर भी जोर दे रहे हैं. दिल्ली की अपनी यात्रा से पहले गुरुवार को सीएम ने मुजफ्फरनगर के मीरापुर विधानसभा क्षेत्र में ऋण और नियुक्ति पत्र वितरित किए, जो उपचुनाव वाले क्षेत्रों में से एक है. इससे पहले मिल्कीपुर और कटेहरी निर्वाचन क्षेत्रों में भी इसी तरह के कार्यक्रम आयोजित किए गए थे.

जिन 10 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने हैं, उनमें से 2022 में भाजपा ने तीन सीटें (गाजियाबाद, खैर और फूलपुर) जीती थीं, जबकि सहयोगी निषाद पार्टी और रालोद (अब भाजपा की सहयोगी) ने दो (मझवां और मीरापुर) जीती थीं. सपा ने पांच सीटें (सीसामऊ, मिल्कीपुर, करहल, कटेहरी और कुंदरकी) जीती थीं.

मौजूदा विधानसभा में भाजपा के पास 255 विधायक हैं, उसके सहयोगी दलों के पास 20, सपा के पास 111 और कांग्रेस के पास दो सीटें हैं. लोकसभा चुनाव में यूपी में भाजपा को 33 सीटें मिली थीं, जबकि सपा 37 सीटों पर आगे थी. आदित्यनाथ अपने ही लोगों के साथ-साथ सहयोगियों की ओर से भी आलोचनाओं का शिकार हो रहे हैं. मुख्य आरोप यह है कि सीएम शक्तिशाली नौकरशाहों के साथ मिलकर सरकार चलाते हैं और उनकी शिकायतों पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता.