यूपी विधानसभा चुनाव में बीजेपी को सत्ता विरोधी लहर का डर, उठा सकती है ये बड़ा कदम

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए बीजेपी ने सख्त रणनीति बनाई है. सत्ता विरोधी लहर से बचने के लिए 100 से ज्यादा विधायकों का टिकट कट सकता है और केवल जिताऊ उम्मीदवारों को ही सिंबल मिलेगा.

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Sagar Bhardwaj

उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने बेहद सतर्कता बरतनी शुरू कर दी है. पार्टी किसी भी तरह का जोखिम उठाने के मूड में नहीं है और नेताओं को आपसी टकराव दूर रखने का सख्त संदेश दे दिया गया है. टिकट बंटवारे को लेकर पार्टी ने स्पष्ट कर दिया है कि इस बार सिफारिशों या गुटबाजी की जगह केवल शीर्ष नेतृत्व की आम राय और निष्पक्ष सर्वे ही अंतिम आधार होंगे. सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इंकंबेंसी) का सामना कर रहे वर्तमान विधायकों का टिकट काटने में कोई नरमी नहीं बरती जाएगी और केवल जिताऊ उम्मीदवारों को ही सिंबल दिया जाएगा.

2024 के लोकसभा चुनाव से बीजेपी ने ली सीख

बीजेपी की इस नई रणनीति के पीछे 2024 के लोकसभा चुनावों का कड़वा अनुभव है. वर्ष 2019 में पार्टी ने यूपी की 80 में से 62 सीटें जीती थीं, लेकिन 2024 में यह आंकड़ा घटकर केवल 36 सीटों पर आ गया और वोट शेयर 49.6% से गिरकर 41.4% रह गया. यद्यपि आधिकारिक रूप से पार्टी विपक्ष के संविधान और आरक्षण से जुड़े अभियानों को इसका कारण मानती है, लेकिन अंदरूनी तौर पर यह स्वीकार किया गया कि अति-आत्मविश्वास, दिल्ली-लखनऊ के बीच खींचतान और मौजूदा सांसदों को बिना सर्वे के दोबारा मौका देना हार की मुख्य वजह बना.

टिकटों के दोहराव और एंटी-इंकंबेंसी का खामियाजा

2024 के चुनाव में पार्टी ने एंटी-इंकंबेंसी को नजरअंदाज करते हुए 49 मौजूदा सांसदों को दोबारा मैदान में उतारा था, जिनमें से 27 उम्मीदवार चुनाव हार गए. कुल मिलाकर 2019 के 54 प्रत्याशियों को दोहराया गया था, जिनमें से 31 को शिकस्त का सामना करना पड़ा. इस हार की लपेट में कई केंद्रीय मंत्री जैसे स्मृति ईरानी, अजय मिश्रा टेनी, कौशल किशोर, डॉ. महेंद्र नाथ पांडेय, साध्वी निरंजन ज्योति, भानु प्रताप सिंह वर्मा और डॉक्टर संजीव बालियान आ गए. इसके अलावा मेनका गांधी, राजवीर सिंह, लल्लू सिंह और सुब्रत पाठक जैसे वरिष्ठ नेताओं को भी हार झेलनी पड़ी.


भीतरघात, प्रशासनिक असहयोग और वोटिंग प्रतिशत में गिरावट

हार के कारणों का विश्लेषण करने पर पार्टी ने पाया कि कई क्षेत्रों में भितरघात हुआ और कार्यकर्ताओं की नाराजगी के कारण वे चुनाव प्रचार से दूर रहे. राज्य में बीजेपी सरकार होने के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर अपेक्षित सहयोग न मिलने और मतदाताओं की उदासीनता से मतदान प्रतिशत में भारी गिरावट दर्ज की गई. उदाहरण स्वरूप, मुजफ्फरनगर में मतदान में 9.07% की कमी आई और पार्टी उम्मीदवार संजीव बालियान 24,672 वोटों से चुनाव हार गए.

बीते दो वर्षों में कमियों को दूर करने के प्रयास

पिछले दो वर्षों में पार्टी संगठन और सरकार ने इन सभी कमियों को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाए हैं. नए प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने कार्यकर्ताओं का असंतोष दूर करने के लिए पूरे राज्य का दौरा किया और नई टीम के गठन में सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व दिया. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी लगातार मंडलों का दौरा कर विधायकों और कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद स्थापित किया है. इसके अतिरिक्त, संगठन महामंत्री बी.एल. संतोष के निर्देशों पर बूथ स्तर की कमेटियों का पुनर्गठन किया गया है और नए मतदाता सूची के अनुसार जनसंपर्क अभियान चलाया जा रहा है.

100 से ज्यादा विधायकों का टिकट कटने की संभावना

आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी आपसी सहमति से ही टिकट तय करेगी ताकि नेताओं के अहम का टकराव न हो. 255 वर्तमान विधायकों में से 100 से अधिक विधायकों के टिकट काटे जा सकते हैं. इनके स्थान पर बड़ी संख्या में महिलाओं और युवाओं को अवसर देने की योजना है. लगातार जीतते आ रहे विधायकों के रिपोर्ट कार्ड और प्रदर्शन पर कड़ी नजर रखी जाएगी. बीजेपी पश्चिम बंगाल में मिली ऐतिहासिक सफलता के बाद उत्तर प्रदेश जैसे अपने मजबूत गढ़ में कोई अप्रत्याशित झटका नहीं चाहती और राज्य में हैट्रिक लगाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है.