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आम को लेकर हुए झगड़े के बाद हुआ था मर्डर, पढ़िए 40 साल तक चले इस केस की कहानी

कोर्ट ने हत्या के दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाते हुए कहा मात्र एक छोटे से आम के लिए एक बच्चे ने अपने पिता को खो दिया. सामंती कट्टरता इस हद तक जा सकती है कि एक युवक की मौत हो जाये, वो भी सिर्फ इसलिए कि उसके बेटे ने आरोपी के बेटे से आम छीन लिया था. 

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आम को लेकर हुए झगड़े के बाद हुआ था मर्डर, पढ़िए 40 साल तक चले इस केस की कहानी
Courtesy: social media

UP Crime News: मामला 1984 का है, अप्रैल की चिलचिलाती गर्मी का एक दिन था. डब्बू को एक आम दिखाई देता है, रुद्र कहता है कि यह आम उसका है. उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के लोरहिया घाटा गांव के एक खेत के पास पड़े आम को लेकर दोनों दोस्तों में झगड़ा हो जाता है. इस झगड़ा का परिणाम यह होता है एक शख्स की हत्या हो जाती है. हत्या का यह मामला लोअर कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक 40 साल चलता है.

24 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हत्या की सजा को कम कठोर गैर इरादतन हत्या में बदल दिया लेकिन फैसला आने से कुछ सालों पहले ही दोनों आरोपियों रुद्र प्रताप सिंह के पिता अयोध्या सिंह और चाचा लालजी सिंह की मौत हो गई और दोनों परिवारों के बीच रिश्ते भी पूरी तरह से बदल गए.

क्या बोले रुद्र
रुद्र ने बताया, 'इस घटना के कारण समाज ने उनका बहिष्कार कर दिया. हमें किसी भी कार्यक्रम में नहीं बुलाया जाता था. 15 सालों तक कोई हमारे घर नहीं आया. मेरे परिवार के लिए यह बहुत कठिन समय था.' 

क्या था पूरा मामला
कोर्ट के दस्तावेजों के अनुसार, विश्वनाथ का 10 साल का बेटा ब्रिजेश सिंह उर्फ डब्बू उस समय 10 साल का था. अपने पड़ोसी और दोस्त रुद्र (9) के साथ खेलते समय डब्बू को 19 अप्रैल 1984 को एक आम मिलता है. आम को लेकर डब्बू  दावा करता है कि यह आम उसे अपने पिता के खेत में मिला है जिसकी वजह से रुद्र रोने लगता है.

बेटे का रोना नहीं हुआ बर्दाश्त
रुद्र की रोने की बात उसके पिता अयोध्या और चार अन्य लोगों बहादर सिंह, लालजी सिंह, भरत सिंह और भानू प्रताप सिंह को पता चलती है. बेटे के रोने की बात सुनकर पिता अयोध्या इन चारों लोगों के साथ हथियारों से लैस होकर बाग में जाते हैं. जैसे ही इन लोगों ने डब्बू को डांट लगाई पास ही के खेत में गेंहू काट रहा डब्बू का पिता विश्वनाथ दौड़कर आता है. इसके बाद हालात बिगड़ जाते हैं. कोर्ट के दस्तावेजों के अनुसार, सभी लोग विश्वनाथ को लाठी-डंडों से बुरी तरह पीटते हैं.

बचाव में विश्वनाथ ने अपनी खोदनी से अयोध्या और उसके साथियों पर जवाबी हमला किया. इसी दौरान विश्वनाथ के दो भाई जगन्नाथ सिंह और जगदीश सिंह घटना स्थल पर पहुंचते हैं, लेकिन कोर्ट के दस्तावेजों के आधार पर अयोध्या के लोगों द्वारा कथित तौर पर उन्हें भी मारा जाता है. जैसे ही चार अन्य लोग बीच बचाव के लिए वहां पहुंचते हैं तब जाकर झगड़ा शांत होता है और आरोपी वहां से चले जाते हैं.

विश्वनाथ ने तोड़ा दम
विश्वनाथ को इतनी बुरी तरह पीटा गया कि अस्पताल ले जाते वक्त वह रास्ते में ही दम तोड़ देता है. इस मामले में जगन्नाथ के भाई कि शिकायत पर एफआईआर दर्ज होती है. पोर्टमॉर्टम रिपोर्ट में खुलासा होता है कि हमले के कारण विश्वानाथ के सिर पर गहरे घाव थे और उसके शरीर की कई हड्डियां टूट चुकी थीं.

कोर्ट ने सुनाई आजीवन कारावास की सजा
4 अप्रैल 1986 को गौंडा की ट्रायल कोर्ट पांचों को हत्या का दोषी, दंगा और गैरकानूनी सभा करने का दोषी मानते हुए सभी को आजीवन कारावास की सजा सुना दी. कोर्ट ने कहा कि जिस समय विश्वनाथ की मौत हुई वह 28 साल का था. उसके बेटे डब्बू ने मात्र एक छोटे से आम के लिए अपने पिता को खो दिया. सामंती कट्टरता इस हद तक जा सकती है कि एक युवक की मौत हो जाये, वो भी सिर्फ इसलिए कि उसके बेटे ने आरोपी के बेटे से आम छीन लिया था. 

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दी जमानत
हालांकि आरोपियों ने उसी साल इलाहाबाद हाई कोर्ट में सजा के खिलाफ अपील कर दी. केस काफी धीमी गति से आगे बढ़ रहा था. जल्द की कोर्ट ने पांचों आरोपियों को जमानत दे दी. दिसंबर 2022 को हाई कोर्ट ने लोअर कोर्ट के फैसले को बरकार रखा. इस हत्या के दो दोषियों की तब तक मौत हो चुकी थी और तीन दोषी बहादुर सिंह, भरत सिंह और भानु प्रताप सिंह अभी भी जिंदा हैं. आरोपियों ने कोर्ट में दलील दी थी कि उनका इरादा विश्वनाथ को जान से मारने का नहीं था लेकिन कोर्ट ने उनकी दलील मानने से इंकार कर दिया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट उनकी दलील के प्रति अधिक संवेदनशील था.

24 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी दलील सुनने के बाद उनकी सजा को  गैर इरादतन हत्या में बदलते हुए उनकी सजा को सात साल कर दिया. कोर्ट ने कहा कि यह योजनाबद्ध तरीके से की गई हत्या नहीं थी और लाठी का इस्तेमाल बताता है कि विश्वनाथ को मारने का इरादा नहीं था.

40 साल पहले हुई लड़ाई को लेकर अब क्या कहते हैं दोनों
बहरहाल जिस आम के पेड़ के पास यह लड़ाई हुई थी वह आम का पेड़ आज भी विश्वनाथ के खेतों में खड़ा हुआ है. वहीं डब्बू और रुद्र दोनों 50 साल के हो चुके हैं. दोनों ने बच्चे और पोता-पोती हैं. हालांकि दोनों इस घटना के कुछ साल बाद तक एक-दूसरे के बगल में रहे लेकिन उन दोनों की दोस्ती फिर कभी पहले जैसी नहीं हो सकी. दोनों ने एक-दूसरे के घर जाना बंद कर दिया और आखिर में दोनों के घर भी एक-दूसरे से 800 मीटर की दूरी पर हो गए.

अपने पिता की तरह एक ढीला पायजामा पहने किसान की वेशभूषा में अपने घर के बाहर बैठे डब्बू उन दिनों को याद करते हुए बताते हैं, 'मेरे पिता की हत्या के बाद उन लोगों ने हम पर समझौता करने का दबाव बनाया लेकिन मैंने मना कर दिया. रुद्र और उसका परिवार में देखकर भद्दे कमेंट करते थे. वे मुझे हमेशा उकसाने की कोशिश करते थे.'

रुद्र बोले मैं संबंध सुधारना चाहता हूं
हालांकि रुद्र डब्बू पर दबाव बनाने की बात का खंडन करते हैं. रुद्र कहते हैं कि मेरे पिता ने विश्वनाथ सिंह के उकसावे पर ही हमला किया था. रुद्र यह भी दावा करते हैं कि डब्बू के बेटे उसके बेटे से बात करते हैं और वह भी अपने दोस्त के साथ संबंध सुधारना चाहते हैं लेकिन उन्हें  दुश्मनी के अलावा कुछ नहीं मिला है.

नीली टी-शर्ट और शॉर्ट्स पहने रुद्र कहते हैं, 'इस घटना के बाद मेरे परिवार का बहिष्कार कर दिया गया. उन्हें किसी कार्यक्रम में नहीं बुलाया जाता था. 15 साल तक कोई उनके घर नहीं आया. वो बहुत ही कठिन दौर था.'

हम दोनों की दोस्ती खत्म हो गई
हालांकि, एक बात है जो दोनों स्वीकार करते हैं. वे कहते हैं कि उनके पिता की लड़ाई के कारण उन दोनों की दोस्ती टूट गई.  उसी आम के पेड़ पर खुद को संतुलित करते हुए रुद्र अफसोस के साथ कहते हैं, 'कभी-कभी, मुझे लगता है कि हमारे परिवार की प्रगति सिर्फ एक आम के कारण बाधित हुई है.'