'मुसलमान दूसरी देवी की इबादत नहीं कर सकते', मौलाना मदनी बोले- वंदे मातरम के लिए हमें मजबूर नहीं किया जा सकता
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि मुसलमान केवल एक ईश्वर की इबादत करते हैं, इसलिए वंदे मातरम की उन पंक्तियों का गायन उनके धार्मिक विश्वास के खिलाफ है, जिनमें देवी की वंदना है.
राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम को लेकर एक बार फिर विवाद गहराया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे गीत को गाने की अपील की थी, लेकिन मौलाना महमूद मदनी ने इसका विरोध जताया है.
उन्होंने कहा कि इस गीत में ऐसी पंक्तियां हैं जो मातृभूमि को देवी के रूप में प्रस्तुत करती हैं, जबकि मुसलमान केवल एक ईश्वर की इबादत करते हैं. मदनी ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार संविधान में स्पष्ट रूप से दिया गया है, इसलिए किसी को बाध्य नहीं किया जा सकता.
दूसरे के देवी-देवताओं की इबादत नहीं
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि वंदे मातरम गीत में कुछ पंक्तियां ऐसी हैं जिनमें भारत माता को देवी दुर्गा के रूप में चित्रित किया गया है. उन्होंने कहा कि इस्लाम में ईश्वर एक है और मुसलमान केवल उसी की इबादत करते हैं. इसलिए अन्य देवी-देवताओं की पूजा करना उनके मजहबी विश्वास के खिलाफ है. मदनी ने साफ कहा कि किसी धर्म के अनुयायियों को उनकी मान्यताओं के विरुद्ध कुछ करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता.
अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता देता है
मदनी ने जोर देकर कहा कि भारत का संविधान नागरिकों को पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता देता है. अनुच्छेद 25 हर नागरिक को अपने धर्म का पालन, प्रचार और आचरण करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है. वहीं, अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की आजादी की गारंटी देता है. उन्होंने कहा कि ऐसे में मुसलमानों को पूरे वंदे मातरम गीत को गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले में यह साफ किया है कि किसी को राष्ट्रीय गीत गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता.
PM मोदी ने क्या कहा?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में कहा था कि वंदे मातरम गीत को पूर्ण रूप से गाया जाना चाहिए और इसके किसी भी हिस्से को अलग नहीं किया जाना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि इस गीत की हर पंक्ति भारत माता के गौरव का प्रतीक है और यह देश की एकता का भाव प्रकट करती है. मोदी के इस बयान के बाद कई मुस्लिम संगठनों और प्रतिनिधियों ने खुलकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है.
इतिहास में भी रहा विवाद
मौलाना मदनी ने बताया कि वंदे मातरम पर विवाद नया नहीं है. 26 अक्टूबर 1937 को गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखकर सुझाव दिया था कि केवल पहली दो पंक्तियों को ही राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया जाए. तीन दिन बाद कांग्रेस कार्यसमिति ने इस सुझाव को मान्यता दी थी. तब से यही परंपरा चली आ रही है. मदनी ने कहा कि प्रधानमंत्री का पूरा गीत गाने पर जोर देना इस ऐतिहासिक निर्णय से अलग है.
मुस्लिम समाज में मिश्रित प्रतिक्रिया
मदनी के बयान के बाद मुस्लिम समाज में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं. कुछ लोगों ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता का मामला बताया, जबकि कुछ ने कहा कि वंदे मातरम देशभक्ति का प्रतीक है और इसे मजहबी चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए. हालांकि, मदनी का कहना है कि श्रद्धा किसी पर थोपी नहीं जा सकती और हर नागरिक को अपनी आस्था के अनुसार निर्णय लेने का अधिकार है.