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क्या खुद के फॉर्मूले से ही दूर हो गई है सपा, आखिर क्यों यादवों के नाम पर सिर्फ परिवार में बांटी सीट

Mulayam Family in Lok Sabha Elections: लोकसभा चुनाव के छठे चरण का मतदान होने जा रहा है और वोटिंग अपने आखिरी चरण की तरफ बढ़ चुकी है. इस बीच उत्तर प्रदेश में खुद को यादवों की पार्टी बताने वाली समाजवादी पार्टी को लेकर ऐसा आंकड़ा सामने आया है जो न सिर्फ उसके दावों पर सवाल खड़ा करती है बल्कि बीजेपी के उन आरोपों को भी सच साबित करती है जिसमें वो अखिलेश पर 'समुदाय को एक परिवार तक सीमित रखने' की बात कहते हैं.

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Mulayam Family in Lok Sabha Elections: लोकसभा चुनाव के आगाज के साथ ही समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश ने जीत के लिए 'MY PDA' (मुस्लिम, यादव, पिछड़, दलित और अगड़े गरीब) का फॉर्मूला दिया था और दावा किया था कि बीजेपी को हराने के लिए वो इस बार के चुनावों में इसी फॉर्मूले पर टिकट का बंटवारा करते नजर आएंगे.

समाजवादी पार्टी के लिए हमेशा से ही ये कहा जाता है कि उसके पारंपरिक वोटर्स में में मुस्लिम और यादव जाति के लोग रहते हैं, हालांकि गैर-यादव और ओबीसी वोटर्स में सेंध लगाने के लिए शायद वो अपने मूल वोटर्स को भूल गए और खुद के फॉर्मूल से भटकते नजर आए हैं. वहीं दूसरी ओर बीजेपी लगातार सपा के पारंपरिक वोटर्स में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है.

यादव उम्मीदवार के नाम पर सिर्फ मुलायम परिवार

नतीजन सपा के पारंपरिक वोटर्स भी बीजेपी की ओर झुकते नजर आ रहे हैं. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी 62 सीटों पर चुनाव लड़ रही है लेकिन यादवों के हितैषी होने का दावा करने वाली इस पार्टी ने सिर्फ 5 यादव उम्मीदवारों को ही मैदान में उतारा है. हालांकि मजेदार बात यह है कि सभी यादव उम्मीदवार पार्टी के संस्थापक मुलायम परिवार से ही हैं.

2019 में, जब सपा ने मायावती की बीएसपी और जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) के साथ गठबंधन में राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से 37 पर चुनाव लड़ा था, तो उसने 10 यादव उम्मीदवार उतारे थे. सीटों के पर्सेंटेज में देखें तो यहां पर सपा ने 27 फीसदी सीटों पर यादव उम्मीदवारों को उतारा था जबकि उसके खुद के खाते में 46.25 फीसदी सीट ही आई थी. वहीं 2014 में, सपा ने 78 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 12 यादव उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था. इस दौरान भी 4 उम्मीदवार मुलायम परिवार से ही थे.

इस वजह से अखिलेश ने यादवों पर कम लगाया दांव

नाम न छापने की शर्त पर एक सपा नेता ने इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए कहा,'मुसलमान और यादव मजबूती से हमारे पीछे हैं. पार्टी का वोट शेयर तब बढ़ा जब उसने छोटे दलों से हाथ मिलाया, जिन्हें गैर-यादव ओबीसी का समर्थन प्राप्त है. पार्टी ने अन्य ओबीसी समूहों और उच्च जातियों के मतदाताओं तक पहुंचने के लिए अन्य समुदायों के उम्मीदवारों को एकजुट किया है.'

दरअसल अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी इस बार 'MY PDA' जिस वोट बेस पर भरोसा जता रही है उसके तहत उसे उम्मीद है कि मुस्लिम यादव तो उसके साथ खड़े ही हैं लेकिन पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वोटर्स का साथ उन्हें सत्ता की चाभी दिलाएगा. इसलिए सपा ने इस बार भले ही यादव उम्मीदवारों को अपने घर तक सीमित रखा है लेकिन उसने 27 ओबीसी, 11 उम्मीदवार ऊंची जातियों (चार ब्राह्मण, दो ठाकुर, दो वैश्य और एक खत्री सहित) और 4 मुसलमानों समुदाय के उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है. सपा ने एससी-आरक्षित सीटों पर 15 दलित उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है.

बीजेपी-कांग्रेस का क्या है हाल

इसके विपरीत, भाजपा, जो यूपी में 75 सीटों पर चुनाव लड़ रही है (उसने तीन सहयोगियों के लिए पांच सीटें छोड़ी हैं), ने 34 ऊंची जातियों (16 ब्राह्मण, 13 ठाकुर, 2 वैश्य और 3 अन्य ऊंची जातियों से संबंधित) और 25 ओबीसी को मैदान में उतारा है, जिनमें एक यादव (आजमगढ़ में दिनेश लाला यादव) भी शामिल हैं. बाकी 16 सीटें एससी रिजर्व हैं.

इंडिया गठबंधन के हिस्से के रूप में सपा ने इस बार कांग्रेस के लिए 17 सीटें छोड़ी हैं. पार्टी के यादव उम्मीदवारों की बात करें तो इसमें सपा प्रमुख अखिलेश यादव का नाम है जो कि कन्नौज से चुनाव लड़ रहे हैं तो वहीं उनकी पत्नी डिंपल यादव को मैनपुरी से मैदान में उतारा है जिन्हें 2019 में कन्नौज से हार का सामना करना पड़ा था. 

सपा ने अखिलेश के चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव (आजमगढ़), अक्षय यादव (फिरोजाबाद) और आदित्य यादव (बदायूं) को भी उम्मीदवार बनाया है. जहां आदित्य मुलायम के भाई और जसवन्तनगर विधायक शिवपाल यादव के बेटे हैं, वहीं अक्षय सपा संरक्षक के चचेरे भाई राम गोपाल यादव के बेटे हैं, जो राज्यसभा सांसद हैं. धर्मेंद्र मुलायम के भाई अभय राम यादव के बेटे हैं, जो राजनीति से दूर रहे हैं.

जिनकी तय है जीत उन्हीं को दिया टिकट

सपा प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी का दावा है कि उनके उम्मीदवार के चयन में एकमात्र विचार जीत की संभावना थी. उन्होंने कहा,'इस कदम को पार्टी में सभी की मंजूरी थी. कई सीटों पर यादव नेताओं ने दूसरी जाति के लोगों के नाम प्रस्तावित किये. इस बार, विभिन्न समुदायों के नेताओं को मौका दिया गया है.'

2019 में भी मुलायम परिवार के पांच सदस्य रेस में थे. उनमें से, मुलायम यादव मैनपुरी से और अखिलेश यादव आजमगढ़ से जीते थे लेकिन बाकी सभी को हार का सामना करना पड़ा था. फिरोजाबाद में अक्षय, कन्नौज में डिंपल और बदांयू में धर्मेंद्र को हार का सामना करना पड़ा था. इतना ही नहीं एटा, झांसी, पुलपुर, फैजाबाद और वाराणसी में सपा द्वारा मैदान में उतारे गए अन्य यादव उम्मीदवार भी हार गए, पार्टी को मुलायम और अखिलेश द्वारा जीती गई सीटों के अलावा केवल 3 और सीटें मिलीं.

2014 में भी, सपा ने पांच सीटें जीतीं और वो सभी मुलायम परिवार के सदस्यों ने ही जीती थी. जबकि मुलायम ने मैनपुरी और आजमगढ़ दोनों जगहों से जीत हासिल की, जहां उन्होंने चुनाव लड़ा था, धर्मेंद्र, डिंपल और अक्षय ने क्रमशः बदायूं, कन्नौज और फिरोजाबाद से जीत हासिल की. लेकिन फर्रुखाबाद, झाँसी, फैजाबाद, संत कबीर नगर, देवरिया और जौनपुर में पार्टी द्वारा मैदान में उतारे गए अन्य यादव उम्मीदवार हार गए.

बीजेपी ने परिवार तक सीमित रखने का लगााय आरोप

राज्य में भाजपा की बढ़त, जो 2017 के विधानसभा चुनावों से शुरू हुई, को गैर-यादव ओबीसी वोटों के एकीकरण के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है. पार्टी प्रवक्ता अवनीश त्यागी ने टिकट बंटवारे को लेकर सपा की आलोचना की और उस पर “यादवों के प्रतिनिधित्व को एक परिवार तक सीमित रखने” का आरोप लगाया.

उन्होंने कहा,'सपा की रणनीति (गैर-यादव ओबीसी में पैठ बनाने की कोशिश) भाजपा की संभावनाओं को प्रभावित नहीं करने वाली है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आम आदमी से सीधा संबंध है. भाजपा की कल्याण और विकास योजनाएं भेदभावपूर्ण नहीं हैं. पार्टी को सभी समुदायों से समर्थन मिल रहा है.'