सुवेंदु के 'हिंदुत्व' के आगे क्यों बेअसर रहा दीदी का 'खेला'? भवानीपुर में इस वजह से हारी ममता
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को उनके सबसे सुरक्षित गढ़ भवानीपुर में भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी के हाथों 15,000 वोटों से हार झेलनी पड़ी है. 15 साल की एंटी-इंकंबेंसी और कई प्रशासनिक विवादों ने अंततः टीएमसी की विदाई की पटकथा लिख दी.
नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की राजनीति में आज एक ऐसा ऐतिहासिक उलटफेर देखने को मिला है. राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को उनके अपने ही अभेद्य दुर्ग 'भवानीपुर' विधानसभा सीट पर करारी हार का सामना करना पड़ा है. भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता सुवेंदु अधिकारी ने उन्हें 15,000 से अधिक वोटों के अंतर से पराजित किया है. यह परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2021 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम सीट से हारने के बाद ममता बनर्जी इसी भवानीपुर सीट पर हुए उपचुनाव के जरिए जीतकर विधानसभा पहुंची थीं.
भवानीपुर में मतगणना की शुरुआत से ही मुकाबला किसी सस्पेंस फिल्म की तरह रहा. शुरुआती दौर में जब पोस्टल बैलेट की गिनती हुई, तो सुवेंदु अधिकारी ने बढ़त बनाई, लेकिन सातवें राउंड तक पहुंचते-पहुंचते ममता बनर्जी ने जबरदस्त वापसी की. एक समय वह 19,000 वोटों के बड़े अंतर से आगे चल रही थीं और टीएमसी खेमे में जश्न का माहौल था. हालांकि, शाम होते-होते यह बढ़त घटकर केवल 2,900 रह गई. रात 9 बजे तक सुवेंदु अधिकारी ने फिर से पासा पलट दिया और 11,000 वोटों की बढ़त हासिल कर ली, जो अंततः जीत में तब्दील हो गई.
'मिनी इंडिया' के वोटर समीकरणों में बड़ा बदलाव
भवानीपुर को उसकी सामाजिक विविधता के कारण ‘मिनी इंडिया’ कहा जाता है. यहां के सामाजिक ताने-बाने में 42% बंगाली हिंदू, 34% गैर-बंगाली हिंदू और लगभग 25% मुस्लिम मतदाता शामिल हैं. इस चुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया कि गैर-बंगाली व्यापारियों के साथ-साथ बंगाली हिंदू वोटरों का झुकाव भी इस बार भाजपा की ओर मजबूती से बढ़ा है.
मतदाता सूची विवाद और SIR
इस चुनाव परिणाम को प्रभावित करने वाला एक बड़ा कारक मतदाता सूची का 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) माना जा रहा है. रिपोर्ट्स के अनुसार, चुनाव से पहले भवानीपुर की वोटर लिस्ट से लगभग 47,000 से 51,000 नाम हटाए गए थे. टीएमसी का आरोप है कि इसमें बड़ी संख्या मुस्लिम मतदाताओं की थी और यह एक लक्षित कार्रवाई थी, जबकि चुनाव आयोग ने इसे एक नियमित प्रक्रिया का हिस्सा बताया था.
एंटी-इंकंबेंसी और ज्वलंत मुद्दों का दबाव
राज्य में पिछले 15 वर्षों से जारी तृणमूल कांग्रेस के शासन के खिलाफ इस बार स्पष्ट रूप से सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इंकंबेंसी) दिखाई दी. आरजी कर मेडिकल कॉलेज मामले ने महिला सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए, जिससे शहरी मतदाता काफी नाराज थे. इसके अलावा, भ्रष्टाचार, ‘कट-मनी’ और 'सिंडिकेट' जैसे आरोपों ने ममता सरकार की छवि को अपूरणीय क्षति पहुंचाई.
बीजेपी की सटीक रणनीति
भाजपा ने इस सीट को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाते हुए सुवेंदु अधिकारी को मैदान में उतारा और बूथ स्तर पर सूक्ष्म रणनीति तैयार की. अमित शाह की सक्रिय मौजूदगी और गैर-मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण ने भाजपा को बढ़त दिलाने में मदद की. दूसरी ओर, ममता बनर्जी ने अपनी कल्याणकारी योजनाओं और ‘घरेर मेये’ (घर की बेटी) की छवि पर भरोसा जताया, लेकिन शहरी मध्यम वर्ग के असंतोष और बदलती राजनीतिक लहर के सामने उनकी यह रणनीति इस बार विफल साबित हुई.