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India Daily

SIR पर अपनों से ही घिरे अखिलेश यादव, मौलाना रजवी बोले, 'इसे हिंदू-मुस्लिम का मुद्दा न बनाएं'

बरेली में मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने एसआईआर को लेकर अखिलेश यादव के बयान पर आपत्ति जताई है. उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया मतदाता सूची सुधार के लिए है, न कि हिंदू-मुस्लिम विभाजन के लिए.

Kuldeep Sharma
Edited By: Kuldeep Sharma
SIR पर अपनों से ही घिरे अखिलेश यादव, मौलाना रजवी बोले, 'इसे हिंदू-मुस्लिम का मुद्दा न बनाएं'
Courtesy: social media

उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है. समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव के आरोपों पर अब ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने खुलकर प्रतिक्रिया दी है. 

बरेली में उन्होंने स्पष्ट कहा कि एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची को दुरुस्त करना है, न कि किसी धर्म विशेष को निशाना बनाना. उन्होंने इस मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देने को गलत करार दिया.

एसआईआर का उद्देश्य क्या है

मौलाना रजवी बरेलवी ने कहा कि चुनाव आयोग ने एसआईआर कार्यक्रम पूरे देश में मतदाता सूची को अपडेट करने के लिए शुरू किया है. इसका मकसद यह पता लगाना है कि कितने मतदाता स्थानांतरित हो चुके हैं, कितनों का निधन हुआ है और किन नामों में सुधार जरूरी है. इसके लिए हजारों बीएलओ और सरकारी कर्मचारी लगाए गए हैं. उन्होंने साफ किया कि इस प्रक्रिया का किसी भी तरह से धार्मिक ध्रुवीकरण से कोई संबंध नहीं है.

अखिलेश यादव पर सीधा आरोप

मौलाना रजवी ने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव चुनाव आयोग की संवैधानिक प्रक्रिया को हिंदू-मुस्लिम चश्मे से देख रहे हैं. उनका कहना था कि यह कहना कि मुसलमानों के वोट काटे जा रहे हैं, तथ्यहीन और भ्रामक है. उन्होंने इसे गैर-जिम्मेदाराना बयान बताते हुए कहा कि परिपक्व नेता हर सरकारी पहल को सांप्रदायिक नजरिये से नहीं देखते.

मुसलमानों की सक्रिय भागीदारी

मौलाना के अनुसार, यह पहली बार देखा गया कि मुस्लिम समुदाय ने एसआईआर में इतनी गंभीरता दिखाई. देश के अलग-अलग हिस्सों में मजदूरी कर रहे लोगों ने भी परिवार से संपर्क कर समय पर फॉर्म भरवाए. बीएलओ से समन्वय कर त्रुटियां सुधारी गईं और रसीदें सुरक्षित रखी गईं. खाड़ी देशों में काम कर रहे युवाओं ने भी इस प्रक्रिया में पूरी जिम्मेदारी निभाई.

हिंदू समाज में लापरवाही का दावा

मौलाना रजवी ने कहा कि तुलना करें तो एसआईआर में हिंदू समाज की भागीदारी अपेक्षाकृत कम रही. उन्होंने इसे सुस्ती और जागरूकता की कमी बताया. उनका दावा था कि मौजूदा आंकड़ों में मुसलमान आगे और हिंदू पीछे दिखाई दे रहे हैं. हालांकि, उन्होंने इसे किसी प्रतिस्पर्धा से जोड़ने के बजाय जागरूकता का विषय बताया.

सीएए-एनआरसी का असर और निष्कर्ष

मौलाना ने कहा कि सीएए और एनआरसी के दौरान फैले डर ने मुसलमानों को सतर्क बना दिया था. उसी अनुभव के चलते उन्होंने एसआईआर को गंभीरता से लिया. अंत में उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर भरोसा बनाए रखना जरूरी है और राजनीतिक दलों को ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर संयम से बोलना चाहिए, ताकि समाज में अनावश्यक तनाव न फैले.