'किस कानून के तहत बिना नोटिस सील की मस्जिद?' यूपी हाई कोर्ट ने सरकार से पूछे तीखे सवाल

मुजफ्फरनगर में बिना नोटिस के मस्जिद सील करने के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब तलब किया है. अदालत ने कार्रवाई की वैधता और धार्मिक स्थल निर्माण के नियमों पर कड़े सवाल उठाए हैं.

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Kanhaiya Kumar Jha

मुजफ्फरनगर: उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में एक मस्जिद को सील किए जाने के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया है. न्यायालय ने इस प्रशासनिक कार्रवाई की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए जांच शुरू की है कि क्या बिना किसी पूर्व सूचना या सुनवाई के ऐसा कदम उठाना कानून सम्मत है. यह याचिका अहसान अली द्वारा दायर की गई थी, जिन्होंने भूखंड पर अपना मालिकाना हक होने का दावा किया है. न्यायाधीशों ने प्रशासन से इस कार्रवाई के पीछे के वैधानिक आधार की जानकारी मांगी है.

अहसान अली की रिट याचिका के अनुसार, मुजफ्फरनगर स्थित विवादित भूखंड के वे वास्तविक स्वामी हैं. याचिका में बताया गया है कि उन्होंने 20 सितंबर 2019 को प्रवीण कुमार जैन से एक पंजीकृत सेल डीड के माध्यम से यह जमीन खरीदी थी. अहसान अली का पक्ष है कि उन्होंने अपनी वैध संपत्ति पर ही मस्जिद का निर्माण कार्य शुरू किया था. न्यायालय ने इन तथ्यों को रिकॉर्ड पर लिया है और निर्माण कार्य के दौरान किए गए प्रशासनिक हस्तक्षेप की समीक्षा शुरू की है.

प्रशासनिक कार्रवाई और उसका विरोध 

जब निर्माण कार्य चल रहा था, तभी स्थानीय अधिकारियों ने परिसर को अवैध निर्माण का हवाला देते हुए सील कर दिया. याचिकाकर्ता के वकील जगदीश प्रसाद मिश्रा ने न्यायालय में दलील दी कि यह कार्रवाई पूरी तरह एकपक्षीय थी. प्रशासन ने अहसान अली को अपना पक्ष रखने का कोई अवसर नहीं दिया और न ही कोई नोटिस जारी किया. नैसर्गिक न्याय का सिद्धांत कहता है कि किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध प्रतिकूल आदेश पारित करने से पहले उसे सुना जाना अनिवार्य है.

उच्च न्यायालय का हस्तक्षेप और पीठ का गठन 

न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने इस मामले में गहरी कानूनी रुचि दिखाई है. 18 मार्च को दिए गए अपने दो पन्नों के आदेश में, न्यायालय ने राज्य सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है. न्यायाधीशों ने पूछा है कि क्या कानून में कोई ऐसा प्रावधान मौजूद है जो नोटिस दिए बिना किसी निर्माणाधीन पूजा स्थल को सील करने की शक्ति प्रदान करता है. अदालत का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि न्यायिक प्रक्रिया के हर स्तर पर हितों की रक्षा हो.

राज्य सरकार से मांगे गए तीन मुख्य जवाब 

उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के सम्मुख तीन विशिष्ट कानूनी प्रश्न रखे हैं. पहला, राज्य किस कानून के तहत धार्मिक स्थल को सील कर सकता है? दूसरा, क्या ऐसे निर्माण के लिए किसी पूर्व वैधानिक अनुमति की आवश्यकता अनिवार्य है? और तीसरा, क्या नोटिस के बिना की गई यह सीलिंग प्रक्रिया कानून की दृष्टि में वैध मानी जा सकती है? न्यायालय ने इन बिंदुओं पर सरकार को हलफनामा दायर कर अपना रुख स्पष्ट करने का निर्देश दिया है.

मामले की वर्तमान स्थिति और अगली सुनवाई 

इस याचिका पर अगली सुनवाई शुरू में 24 मार्च के लिए निर्धारित थी. लेकिन रोस्टर परिवर्तन के कारण इसे दूसरी बेंच के सामने सूचीबद्ध किया गया और उस दिन सुनवाई संभव नहीं हो पाई. फिलहाल, यह मामला न्यायालय में लंबित है और पीठ सरकार के विस्तृत जवाब का इंतजार कर रही है. यह मामला प्रशासनिक शक्तियों के दायरे और धार्मिक स्थलों के निर्माण से जुड़े अधिकारों को स्पष्ट करने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है.