राज्यानुदानित मदरसों में सार्वजनिक रूप से चंदा एकत्र किए जाने को लेकर दाखिल शिकायत के बाद जिला प्रशासनिक स्तर पर मामला गंभीरता से लिया गया है. जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी, बाराबंकी ने जिले के समस्त राज्यानुदानित मदरसों को पत्र जारी कर शिकायत में उठाए गए बिंदुओं पर सूचना उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं.
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि उत्तर प्रदेश के राज्यानुदानित मदरसों द्वारा सार्वजनिक रूप से चंदा रसीद पुस्तिकाओं का उपयोग कर चंदा, जकात, सदका एवं फितरा आदि एकत्र किए जाने की जानकारी विभिन्न माध्यमों से सामने आ रही है.
शिकायतकर्ता इंजीनियर मो. तलहा अंसारी ने यह सवाल उठाया कि जब इन संस्थानों को राज्य सरकार से अनुदान प्राप्त होता है, तो उनके वित्तीय संचालन में प्राप्त चंदे और सरकारी अनुदान की स्थिति क्या है तथा दोनों का लेखा-जोखा किस प्रकार रखा जाता है.
पत्र में संबंधित मदरसों से मुख्य रूप से निम्न बिंदुओं पर जानकारी मांगी गई है:
जिले में कितने राज्यानुदानित मदरसों द्वारा चंदा, जकात, सदका, फितरा अथवा अन्य प्रकार का दान एकत्र किया जा रहा है?
क्या ऐसा चंदा संग्रह किसी वैधानिक प्रावधान, शासनादेश अथवा सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के अनुसार किया जा रहा है? साथ ही क्या मदरसों द्वारा चंदा रसीदें छपवाकर धन एकत्र किया जा रहा है और इसका विवरण वित्तीय अनियमितता निराकरण (FCRA) संबंधी प्रावधानों के अनुरूप दर्ज किया जा रहा है?
यह भी सत्यापित करने को कहा गया है कि चंदा वसूली की आड़ में टैक्स चोरी तो नहीं की जा रही है.
जांच का एक महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि क्या राज्यानुदानित मदरसों के वे शिक्षक, जिन्हें सरकार द्वारा वेतन-सेवा प्राप्त होती है, वे चंदा संग्रह में शामिल हैं या नहीं.
पिछले पांच वर्षों में प्रत्येक राज्यानुदानित मदरसे द्वारा प्राप्त चंदे की राशि, उसके उपयोग तथा उसके लेखा-परीक्षण (ऑडिट) की जांच किए जाने की मांग की गई है.
संबंधित संस्थानों द्वारा आयकर अधिनियम, विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम 2010 तथा अन्य वित्तीय एवं वैधानिक प्रावधानों का पालन किया जा रहा है या नहीं, इसका सत्यापन भी मांगा गया है.
क्या मदरसों द्वारा बिना किसी वैधानिक प्रावधान अथवा आवश्यक अनुपालन के चंदा एकत्र किया जा रहा है? यदि ऐसा पाया जाता है तो उसके विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई किए जाने का मुद्दा उठाया गया है.
यदि चंदा प्राप्त किया जा रहा है तो रसीद संख्या, प्राप्ति/दिशा-निर्देश और चंदा प्राप्ति से संबंधित रिकॉर्ड उपलब्ध कराने की बात कही गई है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि सरकारी अनुदान प्राप्त करने वाले संस्थानों में वित्तीय पारदर्शिता किस स्तर पर है.
चंदे की लेखा-जोखा प्रक्रिया, ऑडिटिंग तथा सार्वजनिक उत्तरदायित्व से जुड़े नियमों और अनुपालन की स्थिति भी स्पष्ट करने को कहा गया है.
जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी संजय मिश्र द्वारा जारी पत्र में प्रकरण को “संवेदनशील एवं महत्वपूर्ण प्रकृति” का बताते हुए कहा गया है कि मामला व्यापक जनहित एवं छात्रहित से जुड़ा है. संबंधित बिंदुओं पर सूचना तीन दिवस के भीतर कार्यालय को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि मामले में आवश्यक कार्रवाई की जा सके.
इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि यदि राज्यानुदानित मदरसों में चंदा एकत्र किया जाता है तो
कितना चंदा आता है?
किससे लिया जाता है?
किसके नाम पर रसीद काटी जाती है?
पैसा किस खाते में जमा होता है?
कहां खर्च होता है?
उसका ऑडिट कौन करता है?
क्या इसकी पूरी जानकारी संबंधित सरकारी विभागों को दी जाती है?
इन सवालों के जवाब मिलने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि शिकायत में लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है और राज्यानुदानित मदरसों की चंदा व्यवस्था वास्तव में कितनी पारदर्शी और नियमसम्मत है.
पत्र की प्रतिलिपि निदेशक, अल्पसंख्यक कल्याण, उत्तर प्रदेश; जिलाधिकारी बाराबंकी; मुख्य विकास अधिकारी बाराबंकी तथा शिकायतकर्ता को भी भेजी गई है. ऐसे में अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि संबंधित मदरसों से तीन दिन में कौन-कौन से दस्तावेज और आंकड़े सामने आते हैं और विभाग आगे क्या कार्रवाई करता है.